अल-दाई अल-अजल सैयदना ताहेर फखरुद्दीन (त.उ.श.) ने आज जुमोआ के दिन पहली वाअज़ में इस्लाम व ईमान की ज़िकर में फरमाया कि मौलाना अली (स.अ.) और मौलातोना फातेमा की शादी से इस्लाम व ईमान की शादी हुई. मौलातोना फातेमा के ज़रिए से रसुलुल्लाह (स.अ.व.) और मौलाना अली (स.अ.) की नसल में इमामत का सिलसिला कयामत तक बाकी रहेगा.

हुसैन इमाम (स.अ.) की शहादत के कारण इस्लाम बाकी है. आपकी नसल में अइम्मत नस्स ब नस्स काइम होते रहेंगे. वे इस्लाम व ईमान काइम करते है और अइम्मत के सतर में दोआत इमाम की इजाज़त से हकीकतन इस्लाम व ईमान काइम करते है. दोआत इस्लाम और ईमान की हिफाज़त करते है और इस कार्य में अपनी जान भी फिदा करते है. सैयदना अब्देअली सैफुद्दीन (री.अ.) ने फरमाया है कि दुआतों का मंज़ेलत (दर्जा) करबला के शोहदा से कम नहीं है. सैयदना बुरहानुद्दीन (री.अ.) ने फरमाया है कि दुआत के सबब रसुलुल्लाह (स.अ.व.) जिस तरह नमाज़ पढ़ते थे उसी तरह आज हम नमाज़ पढ़ रहे है.

बावनवे व तेप्पनवे दाई के वारिस ने मुमेनीन को अमीरुल मुमेनीन (स.अ.) के खुतबे में से बिशारत सुनाई.

सैयदना फखरुद्दीन (त.उ.श.) ने फरमाया कि दावत की मजलिस की खूबी किस वजह से है कि वह इमाम और इमाम के दाई की रज़ा से होती है. यह हक का अमल है. अइम्मत के ज़माने में इमाम हसीर पर जलवानुमा होते और इमाम हुसैन (स.अ.) का गम करते और इमाम हुसैन (स.अ.) के नाम पर नियाज़ करते थे.

कयामत के दिन जिन मर्दों ने हुसैन इमाम (स.अ.) पर आंसू बहाए होंगे और मातम किया होगा उनका हाथ थाम कर रसुलुल्लाह (स.अ.व.) जन्नत में दाखिल कर देंगे और मुमेनात को मौलातोना फातेमा हाथ थाम कर जन्नत में दाखिल करेंगी.

मुमेनीन को वसिय्यत करते हुए सैयदना फखरुद्दीन (त.उ.श.) ने फरमाया कि हमेशा मातम करते रहना और आंसू बहाते रहना. मातम की फल्सफत (अर्थ) समझकर मातम करना चाहिए. सैयदना कुतबुद्दीन (री.अ.) फरमाते थे कि मातम की हिकमत पहचानकर मातम करो और आंसू बहाओ. हुसैन इमाम का मातम करने में व आप पर आंसू बहाने में हिकमत के कई पहलू है.

अशारा मुबारका की मजालिस में आले मोहम्मद के उलूम के जवाहिर नशर किए जाते है. इस खजाने में से किसी को कुछ भी हासिल हो जाए तो दुनिया उसे कभी नहीं बहका सकेगी.

मौलाना अली (स.अ.) ने फरमाया है कि इस्लाम का नाम खुदा के नाम “अल-सलाम” से उत्पन्न हुआ है. हक की बुनियाद इस्लाम है, हिदायत का मार्ग इस्लाम है, इस्लाम से कोई जियादा शरफ नहीं है. सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) ने फरमाया है कि इस्लाम एक ज़ात है. दुनिया की तमाम भलाई इस्लाम में है.

कुराने मजीद में इस्लाम का शब्द ६ जगह है. ६ आयात में से ५ में पंजतन की मुराद है और एक में इमाम और इमाम के सतर में दाई की मुराद है. सैयदना फखरुद्दीन (त.उ.श.) ने अजब शान से और अनोखे अंदाज़ से इन ६ आयात का अर्थ बयान फरमाया.

रसुलुल्लाह (स.अ.व.) ने इस्लाम का मज़हब कलेमतुश शहादत पढके काइम किया और अल्लाह की तवहीद की तरफ दावत की. ज़ाहिर तौर पर जो कलेमतुश शहादत पढता है उसके खून-माल को अमान तो मिल जाता है लेकिन उसके कर्मो का हिसाब खुदा पर है. लेकिन जो कलेमतुश शहादत इखलास से पढता है वह जन्नत में दाखिल हो चुका है.

रसुलुल्लाह (स.अ.व.) को अल्लाह तआला से फरमान था कि इस्लाम के खातिर लोगों के साथ जिहाद करें मगर ईमान में कोई ज़बरदस्ती नहीं है. ईमान तो तब हासिल होता है जब वह दिल में उतरता है. जिनका दिल से इकरार करो और उनकी ताअत करो तभी ईमान हासिल होता है.  मुमिन मीसाक दिल से मान कर दे तो ही सही होता है.

सैयदना फखरुद्दीन (त.उ.श.) ने जुमोआ के दिन के फज़ाइल बयान किए और सलवात पढने की अहम्मियत बयान की और नसीहतें फरमाई.

सैयदना (त.उ.श.) ने फरमाया कि जो शख्स इस्लाम व शरीअत के मुताबिक अपनी ज़िन्दगी गुज़ारेगा तो हर अमल में उसे सवाब मिलेगा और उसकी आखेरत का तोशा तैयार होगा.

आपने पिछले वर्ष की अखबार ज़िकर की और फरमाया कि कई जगहों से लोग मीसाक में दाखिल हो रहे है. सैयदना फखरुद्दीन (त.उ.श.) ने इरादा फरमाया है कि इंटरनेट (internet) के माध्यम से लोगो के साथ बैठक की जाएँ और आपकी हज़रत में अर्ज़ किए गए सुवालों के जवाब इंटरनेट द्वारा नशर किए जाएँ.

सैयदना फखरुद्दीन (त.उ.श.) ने बहुत दुआएँ फरमाई और जीवन में अच्छे मूल्यों को अपनाने की ताकीद फरमाई. आप मौला ने हम्द सलवात और इमाम हुसैन (स.अ.) की शहादत पर वाअज़ तमाम फरमाई.