بسم الله الرحمن الرحيم

وَعَدَ اللَّهُ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا وَمَسَاكِنَ طَيِّبَةً فِي جَنَّاتِ عَدْنٍ ۚ وَرِضْوَانٌ مِّنَ اللَّهِ أَكْبَرُ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ

खुदा तआला ने मुमिनीन और मुमेनात को जन्नत का वादा किया है जहाँ उन्हें हमेशा रहना है, जहां नेहरे बहती है, उस जन्नाते अदन में उनके लिये महल है, और इन सब से बढ़कर खुदा की रिज़वान है, यही फौज़े अज़ीम है

(सूरह अल तौबा : ७२)

Syedna Qutbuddin RA

इमाम अहमद अल मस्तूर स अ इखवान उस सफा की रिसालत शरीफ में सुकरात हकीम की ज़िक्र फ़रमाते है। जिस वक्त सुकरात हकीम की आखरी साँसे थी, आप के शागिर्द (शिष्य) आप के पास जमा होकर आहोज़ारी कर रहे थे, रो रहे थे। हकीम ने उन सब से पूछा की आप सब क्यों रो रहे हो, आप को तो मुझसे फायदा हुआ है और तुम्हे मालूम है कि मैं तो सुकून की जगह में जा रहा हूँ, वहां इस दुनिया की परेशानी या फ़िक्र नहीं, कोई दगासाजी नहीं, तुम सब जानते हो कि तुम्हारा साथ छोड़ मैं अब ओलोमा और फोज़ोला के साथ रहूँगा। रोते रोते हकीम के शागिर्दों ने अर्ज़ की, हमे मालूम है कि आप तो जन्नत में सीधार रहे है, हम आप के लिये नहीं रो रहे, हम अपने लिये रो रहे है, हमें होने वाली कमी पर रो रहे है, एक शफीक बावा और आलिम हकीम की जुदाई पर हम रो रहे है।

कुछ वर्ष पहले, एक मुमेना जो एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में पढ़ रही थी, वहाँ से कुछ वक्त के लिये अभ्यास छोड़ कर सैयदना कुत्बुद्दीन की हज़रत आलियाह में इल्म हांसिल करने की नियत से आ गयी। जब यूनिवर्सिटी के काउन्सिलर ने उनसे इसकी वजेह पूछी तो मुमेना ने उनसे कहा कि अगर आप के इख्तियार में होता, आप को सुकरात हकीम के पास से इस्तेफ़ादा लेने का मौका मिलता तो क्या आप ऐसा मौका कभी हाथ से जाने देते थे।

सैयदना कुत्बुद्दीन के वफात का सदमा अभी हमारे दिलो में ताज़ा है, सबर करना मुश्किल है, दारुस सकीना पर मौला की कदमबोसी के लिये अक्सर आते थे, अब उस मौला की जियारत पर आते है । जब आप मौला को याद करते है तो यकीन नहीं होता कि आप के मिसल एक कुदसी फ़रिश्ता, “खैर ए कुल”, हमारे दरमियाँ रहा करते थे, हमारे हक मे दिन रात दोआए फरमाया करते थे।

सैयदना कुत्बुद्दीन आका ने अपने जीव ज़ात को दावत की और इमाम उज़ ज़मान की खिदमत में गुज़ार दी। तूफ़ान में दावत के सफीने को चलाते रहे, दावत की हिमायत करते रहे। सफीने के कप्तान बन कर अडग खड़े रहकर, एक के बाद एक मौज का मुकाबला किया।

आप ने नौजवानी में आप के वालिद सैयदना ताहेर सैफुद्दीन रि.अ. की खिदमत बजाई और बाद में पचास (५०) साल तक आप के भाई, आप के नास, सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन रि.अ. की आप के माज़ून अल मुतलक के रुतबे में काइम हो कर खिदमत की । और बावन व़े (५२) दाई के वफात के बाद त्रेपन व़े (५३) दाई काइम हो कर इमाम उज़ ज़मान की दो (२) साल और तीन (३) महीने ख़िदमत की। मुमिनीन के लिये कुत्बुद्दीन मौला यकीन के स्तंभ थे, शफ़क़त के दरिया थे, और इस दुनिया के तूफ़ान में हक्क की सही राह पर चलने और हिदायत लेनेवालो के लिये रोशन चिराग, सिराजे मुनीर थे। 

सैयदना कुत्बुद्दीन शहीद के हमनाम, सैयदना खुज़ैमा कुत्बुद्दीन के तवक्कुल की शान मेहनत और मुसीबत की अँधेरी रात में अजब रोशन थी। सैयदना बुरहानुद्दीन आका के वफात के बाद, एक तरफ आप के वफात का सदमा और हुज़ुन था, और एक तरफ मुद्दई दावत के मेहराब और मिनबर पर कब्ज़ा कर के हमले पर आमादा थे। जिस मौला की ताअत के कसम सैयदना बुरहानुद्दीन मुमिनीन से हर मीसाक में लिया करते थे, उस मौला पर काबिज़ो ने लानत पढ़ी। इस दौरान सैयदना कुत्बुद्दीन ने दारुस सकीना में सुकून और वकार के साथ चालीस (४०) दिन तक सैयदना बुरहानुद्दीन मौला की नीयत पर खतमुल कुरआन की मजलीस अकद फरमाई। एक तरफ दुश्मन की नीच हरकते, और एक तरफ सैयदना कुत्बुद्दीन का वकार और सकीनत। आप फरमाते थे कि हर तरफ तूफ़ान है, मगर मैं हक्क पर हूँ, और इस वजेह से मुझे इत्मीनान और सुकून है।

सैयदना कुत्बुद्दीन की सूरत हमेशा के लिये नक्श रहेगी। आप पर दुश्मनी के तीर और तलवारे चल रही थी और आप दावत के अलमदार, अलम लेकर अडग साबित उल जाश खड़े रहे। तूफान भी कैसा सख्त, डूंगर हिले तो हिले, मगर आप दावत काइम करते रहे। मुमिनीन की हिफाज़त करते रहे, मुमिनीन की नजात की फ़िक्र करते रहे, उसकी तदबीर करते रहे। आप की कुव्वत इमाम उज़ ज़मान की ताईद से, आप के यकीन और अज़म मुसम्मम से, दावत का परचम लहराता रहा। सैयदना ताहेर सैफुद्दीन आका कसीदे में फरमाते है कि क्या फातेमी अइम्मत का परचम दोआत मुतलकीन के सबब खाफेकैन में – मगरिब और मशरिक़ में लहरा रहा है या नहीं।

Syedna Qutbuddin RA

اَلَيسَ لِوَاءُ الفَاطِمِيِّينَ سَادَةِ الـ*ـاَنَامِ بِهِمْ فِي الخَافِقَيْنِ بِخَافِقِ

सैयदना कुत्बुद्दीन ने आलमे बाला की सफर नहीं फरमाई मगर आप ने दावत के इल्म को अपने वारिस, अपने मनसूस, आप के हममिस्ल और हमशान, आप के हमसूरत और हमसीरत, आप के फ़र्ज़न्द अरजुमंद सैयदना ताहेर फखरुद्दीन आका त.उ.श. की तरफ दावत का इल्म सौंप कर सिधारे। चौवन व़े (५४) दाई के ज़रिये तमाम दोआत मुतलकीन और खास्सतन सैयदना कुत्बुद्दीन मौला की बरकात जारिया है । फखरुद्दीन मौला कुत्बुद्दीन मौला की फ़तहे मुबीन है । फखरुद्दीन मौला गोया कुत्बुद्दीन मौला ही है । फखरुद्दीन मौला के सबब, आप को देखकर हम सब्र बाँधते है ।

सैयदना अब्देअली सैफुद्दीन रि.अ. आपकी एक रिसालत शरीफ में ज़िक्र फरमाते है की एक हकीम ने कहा है कि, "وَاِنْ لَمْ تَصْبِرْ فَمَاذَا تَصْنَع" सब्र नहीं करोगे तो क्या करोगे, सैयदना कुत्बुद्दीन की सब्र और हिम्मत बेमिसाल है, आप की मुमिनीन के खातिर शफ़क़त यादगार है, और फ़जर और सांझ में आप ने जो दोआए फरमाई वह लाक़ीमत खज़ाना है ।

पीढ़ियो तक कुत्बुद्दीन मौला की ज़िक्र होती रहेगी। मुमिनीन आप को याद कर के और आप की इकतेदा करके सिराते मुस्तक़ीम पर चलते रहेंगे, दावत की खिदमत करते रहेंगे, खैर के अमल करते रहेंगे।

हम खुदा का हमेशा शुकुर करते है कि हमें इस कुदसी फ़रिश्ता को देखना नसीब हुआ। आप के साथ हम इस दुनिया में रहे। मौला का नूरानी चेहरा, आप का तबस्सुम, आप की सूरत हमेश हमारे दिलो में नक्श रहेगी। आप के अज़म को याद करके हमे हिम्मत मिलती रहेगी। आने वाले युगों तक लोग कुत्बुद्दीन मौला की ज़िक्र सुन कर यह ख्याल करेंगे कि आप जैसे एक फ़रिश्ता बशरी कालीब में इस ज़मीन की पीठ पर थे, अजब नसीब उनका जो उनके साथ रहे।

खुदा तआला हमे तौफीक अत़ा करें कि कुत्बुद्दीन मौला की याद हम जिंदा करते रहे। यह किस तरह से, कि आप की इकतेदा कर के, आप के नक़्शे कदम पर चल कर आप मौला का शुकुर करते रहे, हक्क पर साबित कदम रहे। आप के वारिस की खिदमत बजाएँ। ता के जिस बात की कुत्बुद्दीन मौला ने बिशारत दी है, आप के जाँनशीन की फ़तहे मुबीन का जशन मनाए। जो उम्मीद सैयदना कुत्बुद्दीन को हम सब में थी उस तरह सैयदना फखरुद्दीन के साये में अमल करते रहे। इस दुनिया में कुत्बुद्दीन मौला का साथ नसीब हुआ, आखेरत में भी उनके साये में खुदा हमें बसांये।