بسم الله الرحمن الرحيم

وَلَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ قُتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتًا ۚ بَلْ أَحْيَاءٌ عِندَ رَبِّهِمْ يُرْزَقُونَ  * فَرِحِينَ بِمَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ وَيَسْتَبْشِرُونَ بِالَّذِينَ لَمْ يَلْحَقُوا بِهِم مِّنْ خَلْفِهِمْ أَلَّا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ * يَسْتَبْشِرُونَ بِنِعْمَةٍ مِّنَ اللَّهِ وَفَضْلٍ وَأَنَّ اللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ الْمُؤْمِنِينَ *

  (सूरत ए आले इमरान : १६९-१७१)

सैयदना क़ुतबुद्दीन त.उ.श. ने इरशाद फरमाया है कि मुमिनीन अशरा मुबारका के मुबारक दिनों में हुसैन इमाम स.अ. और आप के एहले बैत और असहाब की फिदागिरी को याद करे और अज़ादारी (गम) करे।

शेह्ज़ादा ताहेर भाईसाहेब ने एक मुख़्तसर बयान में (फातेमी दावत की वेब साईट पर रेकोर्डिंग है) मुमिनीन को इरशाद फरमाया है कि शोहोदा ए करबला का अमल हम सब के लिये एक मिसाल है । शोहोदा किराम ने दुन्यवी आरजुओं को ठुकरा कर आखेरत की खातिर इमाम उज़ ज़मान हुसैन अ.स. की खिदमत को मुकद्दम किया।

मुमिनीन में से कई लोग है जिन के दिलों में सैयदना क़ुतबुद्दीन त.उ.श. की मोहब्बत है, मगर दुनियावी या पारिवारिक हालात के सबब मोहब्बत का इज़हार जाहरन नहीं कर पाते। इन दिनों में जब हम हुसैन इमाम को याद करते है, क्या ये मुनासिब है, और मुमिनीन को कैसे गवारा हो कि हुसैन इमाम के दाई का ज़ाहिर में साथ न दे? खुदा पर तवक्कुल रख कर फैसला करने के दिन है । आज हम ये दोआ करे कि हमारे भाइयों और बहनों को, जो बेहकावे में आ गये हो, या जो दबाव में आ कर गलत राह पर चले गये हो, खुदा तआला उन्हें हक्क की राह की तरफ़ लौटने की तौफीक अता करें। अब नहीं तो फिर कब?

अगर हम इमाम हुसैन के ज़मान मे होते, तो क्या हम इमाम का साथ न देते? आज जब हम हुसैन इमाम के दाई के ज़मान में है, तो हुसैन के दाई का साथ नहीं देंगे? अशरा के इन दिनों में नहीं तो फिर कब?

खुदा तआला कुरआन मजीद में फरमाते है कि हर एक बशर को इस जहां से अकेला ही जाना है, कोई दोस्त या परिवारजन मदद नही कर सकता। क़यामत के दिन अल्लाह तआला के सामने अकेला ही खड़ा होना है । कुरआन की इस हिदायत को हमेशां मद्दे नज़र रख कर हमे अपने दीन के बारे में खुद फैसला लेना है । अल्लाह तआला और अपनी आखेरत को याद कर लिल्लाह फ़िल्लाह अपनी राह चुननी है । हक़ के सही रास्ते पर चलने इमाम उज़ ज़मान के दाई को जवाब देकर उनके साथ होना है ।

ऊपर लिखी हुइ आयत शरीफ में ज़िक्र है कि जो लोग खुदा की राह में शहीद हुए है, मृतक नहीं है, बलके आखेरत में, जन्नत में जिंदा है । शोहोदा ए करबला अपनी बेमिसाल कुरबानी, अपने नेक अमल और हक्क और सच्चाई के प्रति अडग विश्वास के वजह से आज जिंदा है ।

इन दिनों में जब हम उन्हें याद करते है, साथ में अज़म कर लें कि उनके नक़्शे कदम पर हम भी अपना अकीदा मज़बूत कर लें।