بسم الله الرحمن الرحيم   

أَيَوَدُّ أَحَدُكُمْ أَن تَكُونَ لَهُ جَنَّةٌ مِّن نَّخِيلٍ وَأَعْنَابٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ لَهُ فِيهَا مِن كُلِّ الثَّمَرَاتِ وَأَصَابَهُ الْكِبَرُ وَلَهُ ذُرِّيَّةٌ ضُعَفَاءُ فَأَصَابَهَا إِعْصَارٌ فِيهِ نَارٌ فَاحْتَرَقَتْ ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ * 

 (सूरत अल बकराह : २६६)

क्या तुम मे से कोई एक को यह पसंद होगा की उसका एक बाग़ हो, जिसमे खजुर और अंगूर के बेल हो, उस के तहत नेहर जारी हो, और किसम किसम के फलों से लदी हो, पर जब बुढापा आये, फरजंद अभी छोटे हो, ताके उस बाग़ पर एक गर्म हवा ऐसी चले कि तमाम बाग़ जल जाए, क्या खुदा अपनी आयत में वाज़े इशारा नहीं फरमाते, ताके तुम उसमे तफ़क्कुर करो (सोचो) 

कुरआने मजीद की इस आयत में, करबला में इमाम हुसैन पर जो मुसीबत उतरी उसकी ज़िक्र है, और एक सवाल है कि क्या तुम्हे ये पसंद है की तुम पर या तुम्हारे मोहिब्बो पर ऐसी कोई मुसीबत उतरे? (सिजिल्ल ३८ में रसूलुल्लाह स.अ. की वाड़ी की और इस आयत शरीफा की तफसीर है )

मोहर्रमुल हराम के पहले दस दिन (अशरा मुबारका) अपने नबी मोहम्मद स.अ. के नवासे इमाम हुसैन अ.स. और आप के साथ आपके एहले बैत और ७२ असहाब ने करबला के रन मे बेजोड़ अज़म और कुरबानी की मिसाल काइम की, वह याद ताज़ा करना के दिन है । उस ज़मान के हुक्काम के ज़ुल्म, नाइंसाफी, खौफ और अत्याचार के खिलाफ़ जेहाद मे व़े सब कुरबान हो गए। इमाम हुसैन का काफिला २ रि मोहर्रम सन ६१ हि. (इसवी सन ६८०) के रोज़ करबला पोहंचा, दस दिनों तक दुश्मनों का सामना किया, और आशूरा के रोज़ भूखे प्यासे शहीद हुए। हमारे हुदात किराम की करबला की ज़िक्र की इस खैर रसम के सबब, इमाम हुसैन स.अ. की मुसीबत के उन दिनों की याद हमारे दिलो में ताज़ा हो जाती है, और हम अपनी हद में, हक के खातिर जाँफेशानी का सबक हांसिल करते है । (आंशिक: इस लेख का १ ला भाग पढिये: ८७) अशरा – ज़िक्र (याद-स्मरण), तफ़क्कुर (चिंतन) और तजदीद (ताज़गी) के दिन - भाग १)


 

तजदीद (ताजगी) मोहर्रम के मीकात का मकसद, भाग २.

हमारे हुदात किराम ने नए साल की शुरुआत के दिन इमाम हुसैन की याद के लिये, इल्म नशर करने, नसीहत और मौएज़त (नेक सलाह) देने के लिये, एक अवसर काइम कर दिया जिसके ज़रिये नए साल में मुमिनीन को रूहानी ताज़गी अता हो। अशरा की वाअज़ से मुमिनीन को दुनिया और आखेरत में ऊंचे दर्जे हांसिल करने की हिदायत मिलती है, दिशा मिलती है, और होंसला दिलाती है। अच्छे इंसान बन ने की और ज़िन्दगी में बेहतर अख़लाक़ अपना ने की हिदायत देती है । इस हिदायत से हमे हमारे फरजंद के लिये बेहतर तालीम, कारोबार में भी पूरी लगन से कोशिष, और हर अमल में कमियाबी मिले ताके कौम, समाज और वतन की तरक्की में हम भी हिस्सेदार हो, इन बातों में भी हमारी होंसला अफजाही होती है । 

इस एहेम और मुबारक अवसर पर फिदगिरी, यकीन और दीनदारी के दिली जज़्बात का मान्होल मुमिनीन को एक दुसरे से करीब करता है । हुसैन इमाम की ज़िक्र के सबब, खाससतन अपने हुदात किराम ने उसकी हिकमत के जो बयान फरमाए है उसे मद्दे नज़र रख कर, हमे ज़िन्दगी की एहेम्मियतों की तरतीब वाज़े होती है और उसे दुरुस्त करने की सीख मिलती है । हमें जीवन की चुनौतियों का डट कर मुकाबला करने की कुव्वत मिलती है । 

५२ व़े दाई के जाँनशीन और सभी दोआतों के फज़ल के वारिस, उन दोआतो के मिसल, ५३ व़े दाई सैयदना खुज़ैमा क़ुतबुद्दीन त.उ.श. तमाम मुमिनीन को अशरा की बरकात लेने रगबत दिलाते है । सैयदना की वाअज़ और बयान  ज़िक्र (याद) तफ़क्कुर (चिंतन) और तजदीद (ताजगी) की नहज जारी रखने का अमल है । ज़मान के मुश्किल हालात के बावजूद मुमिनीन जहाँ कहीं रहते हो ये बरकत हांसिल कर सकते है ।

खुदा तआला सैयदना खुज़ैमा क़ुतबुद्दीन को मुमिनीन की हिदायत की खातिर तवील उम्र अता करे और खुदा हमे मौलाना के साथ अशरा मुबारका की बरकत लेने की तौफीक अता करें । खुदा तआला हमे करबला के शोहोदा की मिसाल अपनानेकी और इमाम हुसैन के दाई सैयदना क़ुतबुद्दीन त.उ.श. के साथ साबित कदम रहने की हिम्मत अता करे, जो हुसैन इमाम की याद सही माने में है ।