بسم الله الرحمن الرحيم

شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِي أُنزِلَ فِيهِ الْقُرْآنُ هُدًى لِّلنَّاسِ وَبَيِّنَاتٍ مِّنَ الْهُدَىٰ وَالْفُرْقَانِ ۚ فَمَن شَهِدَ مِنكُمُ الشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُوَمَن كَانَ مَرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۗ يُرِيدُ اللَّهُ بِكُمُ الْيُسْرَ وَلَا يُرِيدُ بِكُمُ الْعُسْرَ وَلِتُكْمِلُوا الْعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُوا اللَّهَ عَلَىٰ مَا هَدَاكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ

शेहरे रमज़ान वह महीना है जिसमें क़ुरआन उतारे गए, जिस क़ुरआने मजीद में लोगो के लिए हिदायत है, हिदायत के सबूत है, फ़ुरक़ान है (सही और गलत के बीच). तुम में से जिसे शेहरे रमज़ान का साया करे वह इस महीने में रोज़े  करे. मरीज़ या सफर पर कोई हो तो  रोज़े आइन्दा दूसरे दिनों में कर ले. अल्लाह तुम्हारे लिए सहलाई (आसानी) चाहते है, दुशवारगी नहीं. तुम शेहरूल्लाह के रोज़े की गिनती को कामिल करो और “अल्लाहो अकबर” तकबीर बोलो कि खुदा ने तुम्हे हिदायत दी और शुक्र गुज़ार बनो.

 

रमज़ानुल मोअज़्ज़म का महीना रोज़े का महीना है. फजर से मगरिब तक रोज़ा रखने वाला खाने पीने से बाज़ रहता है. “सौम” - रोज़ा - इस्लाम का ५ व देआमत है. मीसाक में दिए हुए क़सम के मुताबिक़ हम पर फ़र्ज़ है कि शेहरे रमज़ान के रोज़े बराबर अदा करे, मवाली ताहेरीन के इरशाद मुताबिक़ ३० दिन की गिनती कामिल करे.

इमाम जाफरुस सादिक़ (स.अ.)  फरमाते है कि शेहरे रमज़ान के महीने में रोज़ा रखना फ़र्ज़ है”  और यह भी  फरमाते है कि “रोज़े सही तरह से तब अदा होते है जब मुमिन साफ़ निय्यत रखकर इस महीने के दिन के दौरान खाना, पीना और सम्भोग से दूर रहे और वह सभी चीज़ो से दूर रहे जिसे अल्लाह तआला ने हराम किया है.” सभी अंगों से रोज़ा करने की अहम्मियत पर ताकीद करते हुए मौलातोना फातेमा (अ.स.)  फरमाते है कि रोज़ा करने में फायदा ही क्या है जब तुम अपनी ज़बान, कान, आँख और सभी अंगों पर संयम नहीं रखो।”

कुछ वर्ष पहले एक अखबार में एक पत्रकार ने शेहरे रमज़ान के बारे में एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने यह लिखा कि शेहरे रमज़ान नफ़्स को मेहरूम (रोकटोक) करने का महीना है. सैयदना क़ुतबुद्दीन के शहज़ादे  शेह्ज़ादा डॉ. अब्देअली भाईसाहेब उस वक़्त कैरो- मिस्र में अमेरिकन यनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे. आपने उस अखबार के एडिटर को कागज़ लिखा और उसमें कहा कि, “शेहरे रमज़ान नफ़्स को मनाई करने का महीना नहीं, बल्कि नफ़्स की रियाज़त करने का महीना है.” इस महीने में हम छोटी और बड़ी चीज़ो में हर तरह से नफ़्स की रियाज़त  करते है. नमाज़ के वक़्त के मुताबिक और ख़ास तौर से सिहोरी और इफ्तार के वक़्त के मुताबिक़ हमारी रोज़मररह के काम निपटाते है. खाने-पीने से दूर रहकर हम अपना तवज्जोह आख़ेरत की तैयारी में लगा देते है.

रोज़े के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ क्या है और वह गुण कौन सा है जो रोज़ा रखने से हांसिल होता है कि सब्र. मौलाना अली (स.अ.) फरमाते है कि सब्र की २ किस्मे है - पहला वह कि जो चीज़ नापसंद हो उसपर सब्र. दूसरा यह कि जो चीज़ पसंद हो उसपर सब्र. रोज़े में दोनों सब्र साथ है, भूख पर सब्र और खाने पीने से दूर रहने में सब्र.

ख़ास तौर से दावत में इन मुश्किल हालात में सब्र लाज़िम है. सब्र ईमान का एक स्तंभ है. जिस तरह रमज़ान में हम हर दिन इफ्तार का इंतेज़ार करते है और इफ्तार की ख़ुशी के इतेज़ार के साथ खुदा ने हमारे लिए जो सवाब तैयार किया है उस ख़ुशी का इंतेज़ार करते है, उसी तरह इस मुश्किल वक़्त में हम दो चीज़ों का इन्तिज़ार करें - मुश्किल के दिनों के बाद जो ख़ुशी हांसिल होगी और सब्र करने वालों के लिए आख़ेरत में जो सवाब है, उसका इंतेज़ार करते है. क़ुरआने मजीद में खुदा तआला फरमाते है कि “इन्नमा युवफ्फस साबिरुन अजरहुम बेगैर हिसाब”  - जो सब्र करेगा उसे बे गैरे हिसाब अजर मिलेगा.

अल्लाह तआला हमें इस मुबारक महीने में रोज़े करने के लिए मदद अता फरमाएँ और खुदा की दावत और दाई के साथ मज़बूत खड़े रहने के लिए तौफ़ीक़ अता फरमाएँ. सब्र करने के लिए ताक़त अता फरमाएँ और जल्द ही इस सब्र का सिला अता करे.