بسم الله الرحمن الرحيم

 فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَإِنَّهُ لَلْحَقُّ مِن رَّبِّكَ وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ

मस्जिदे हराम (बैतुल्लाह) के तरफ अपना तवज्जोह (रुख) करो, यह खुदा तआला की तरफ से हक़ है, खुदा आपके अमल से गाफिल नहीं है.

शाबान की १५ वी रातकी अहम्मियत और थम वशेक की माना के विषय पर यह लेख शेह्ज़ादा डॉ. अज़ीज़ भाईसाहब ने १४३६ हि. में लिखा था। इस लेख की ऑडियो सुनने के लिए "प्ले" बटन पर क्लिक करें।

शाबान की १५ वी रात का शरफ और नमाज़ की माअना:

शाबान रसुलुल्लाह (स.अ.व.) का महिना है. इस महीने की १५ वी रात में रसुलुल्लाह को खुदा तआला की तरफ से फरमान आया कि मस्जिदे हराम की तरफ, बैतुल्लाह की तरफ नमाज़ पढ़ें. (पहले मस्जिदे अक्सा की तरफ पढ़ी जाती थी). कुरआन मजीद की इस आयत में इस मुबारक मौके की ज़िक्र है.  सभी आयातों की तरह इस आयत में भी कई माना है. यह मआनी हुदात किराम ने किताबों में बयान की है. एक बयान यह है कि शाबान की १५ वी रात रसुलुल्लाह के महीने के बिलकुल बीच में आती है. तो यह रात रसुलुल्लाह की दावत के दो हिस्सों पर दलालत करती है. एक हिस्सा तंज़ील – जो रसुलुल्लाह पर वेहये से उतरा और जो कुरआन मजीद और शरीअत में समाया हुआ है और दूसरा हिस्सा तावील -  जो तंज़ील में छिपी गहरी मआनी समाई हुई है. रसुलुल्लाह ने तावील का बयान करना मौलाना अली (अ.स.) को सौंपा.

इस रात का शरफ अज़ीम है. इस रात में बरकात के बारिश बरस्ते है. मौलाना अली (स.अ.) ने फ़रमाया है कि पूरे साल में जो ४ मुबारक रात है उनमें से एक शाबान की १५ वी रात है – शाबान की १५ वी रात है. (बाक़ी की तीन रात १) २७ वी रजब की रात (मेराज की रात), २) ईदुल फितर की रात और ईदुल अदहा की रात है. लैलतुल क़दर इन ४ रातों में से एक नहीं है क्योंकि लैलतुल क़दर की शान निराली है). अमीरुल मुमिनीन ने फरमाया है कि मोमिन को यह ४ रात सिर्फ  इबादत और अल्लाह तआला की ज़िकर में गुज़ारनी चाहिए. हुदात किराम के इरशाद के मुताबिक इन चार रातों में हम वशेक की ततव्वो की नमाज़ पढ़ते है. लेकिन १५ वी शाबान के वशेक की निराली शाकेलत है. यह वशेक थम वशेक से जाना जाता है. वशेक की १४ रकअत  इमामुज़ ज़मान के हुदूद और उनकी मारेफ़त पर दलालत करता है: १२ हुज्जत (जिनके पहले बाबुल अबवाब है), दाई और माज़ून. इन १४ हुदूद के ज़रिये और उनकी हिदायत से हम इमामुज़ ज़मान की तरफ पहुँचते है.

सतर के ज़मान में, हमें दाई के ज़रिये इन हुदूद के इल्म व हिदायत का नूर मिलता है और उनकी मारेफ़त हासिल होती है. हमें शुकुर करना चाहिए कि दुनिया में हज़ारों लाखों लोगो में से हमें इमामुज़ ज़मान के दाई, सच्चे दाई, सैयदना ताहेर फखरुद्दीन

(त.उ.श.) की मारेफ़त नसीब हुई. हम उनके साथ है. यह हुदूद हमें तहमीद – अल्लाह तआला का हम्द और शुकुर – की ओर हिदायत देते है, (सूरतुल हम्द की सूरत १४ बार), और हमें तौहीद - खुदा तआला एक है उसकी ओर हिदायत देते है, (कुल होवल्लाहो अहद की  सूरत १४ बार), वे हमें इस्तिआज़त अर्थात हसद और बुराई के लोगों से दूर रहने के लिए अल्लाह तआला से पनाह माँगना सिखाते है, (कुल अउज़ो बेरब्बिल फलक की सूरत १४ बार और कुल अउज़ो बेरब्बिन नास की सूरत १४ बार). यह हुदूद हमें मौलाना अली के इलाही मक़ाम की तरफ हिदायत देते है. इसलिए हम एक बार आयतुल कुरसी की तिलावत करते है. थम वशेक पढ़ कर, इन हुदूद की मारेफ़त करके, हम उन लोगो में से है जिन्हें अल्लाह तआला ने ज़ुल्मत (अंधेरा) से नूर की तरफ हिदायत दी है.

“اللهُ وليٌّ الذين آمنوا يخرجهم من الظلمات الى النور”

दावत के प्रति अपने अज़म और इरादे में स्तम्भ की तरह मज़बूत खड़े रहना

१५ वी रात का वशेक पढना आसान नहीं है. इतने लम्बे अरसे तक खडा रहना और इबादत में ध्यान देना मुश्किल है. उसी तरह अवलियाउल्लाह और उनके हुदूद की वलायत और ताअत में मज़बूत खडा रहना हमेशा आसान नहीं होता. कई बार मुश्किलों का सामना करना

पढ़ता है. दुनिया में अलग अलग शुगुल होते है लेकिन यह ज़रूरी है कि जिस तरह हम अपने जिसम से बैतुल्लाह की तरफ तवज्जोह (रुख) करते है उसी तरह अपने जान से इमामुज़ ज़मान की तरफ तवज्जोह (रुख) करे और इमामुज़ ज़मान के दाई की वलायत और ताअत में  मज़बूत खड़े रहे. इमामुज़ ज़मान की तरफ पहुंच ने के लिए एक ही रास्ता है. वह कौन है कि दाईज़-ज़मान. नजात हासिल करने के लिए एक ही रास्ता है, वह कौन है कि दाईज़-जमान.

इस मौके पर यह भी ज़िक्र कर ले कि दावत के दुश्मन सैयदना बुरहानुद्दीन (री.अ.) के माज़ून और मंसूस की दुश्मनी में माज़ून के रुतबे की दुश्मनी कर बैठे, जिस रुतबे पर शाबान की १५ वी रात के वशेक की १४ में से १ रकअत दलालत करती है. दाई के साथ माज़ून का रुतबा भी उन १४ हुदूद में से एक है. यह सारे हुदूद जिनमें माज़ून का रुतबा भी शुमार है, वे खुदा की तौहीद की तरफ और सिराते मुस्तकीम की तरफ हिदायत देते है.