بسم الله الرحمن الرحيم

يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا ۚ إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ

(सुरतुल हुजुरात : आयत १३)

ऐ लोगो, हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया है और तुम्हारे अलग अलग कबीले किए है ताकि आपस में एक दूसरे के साथ संबंध रखो. तहक़ीक़ खुदा के नज़दीक तुम में से ज़्यादा करीमतर वह है जो ज़्यादा तक़्वा रखता है.

यह लेख शेह्ज़ादा डॉ. अज़ीज़ भाईसाहेब कुत्बुद्दीन ने २०१६ में लिखा हैं.

कुराने मजीद में इंसान की अलग अलग नस्लों और कबीलों की ज़िक्र है और खुदा फरमाते हैं कि यह इसलिए है ताकि आपस में सम्बन्ध रख सके. दुनिया में अलग अलग किस्म के लोग एक साथ सलामती और अमान के साथ रहते है और इसकी कई मिसालें है. लेकिन दूसरी ओर एक दूसरे के लिए नफरत और दुश्मनी की भी मिसालें है. ख़ास तौर से जब लोगों के दरमियान इख्तिलाफ और दूरियाँ पैदा करने की कोशिशें की जाती है. ऐसे वक्त में यह लाज़िम है कि हम लोगों के दरमियान तक़रीब की कोशिश करें यानी लोगो को नज़दीक करने की कोशिश करें.

तक़रीब अरबी लफ्ज़ है जो तीन असली हुरूफ़ से बना है - क़ाफ़, रे और बे - जिसकी माअना लोगों को करीब करने की है. गुजराती, हिंदी और उर्दू में भी यह अरबी लफ्ज़ इस्तेमाल होता है - करीब.

जनाब इब्राहिम रेहमतुल्लाह की सैयदना ताहेर सैफुद्दीन रि.अ. के साथ मुलाक़ात हुई और बात चीत के दौरान जनाब इब्राहिम ने कहा कि मुसलमानों के दरमियान इतना इख्तिलाफ है, यह मेरे दिल पर भारी है. उम्मते इस्लाम के सभी बड़े ओलमा को २-३ हफ्ते एक साथ बैठकर सारे इख्तिलाफ दूर करके एक मान्यता पर मुत्तफिक होना चाहिए. सैयदना ताहेर सैफुद्दीन रि.अ. हमेशा तक़रीब और अमान के साथ रहने की सीख देते, लेकिन आप हमेशा हालात और हकीकत को मद्दे नज़र रखकर इरशाद फरमाते. आपने जनाब इब्राहिम को फ़रमाया कि यह इख्तिलाफ हज़ार साल पुराने है. यह मुमकिन नहीं कि अचानक सब एक मान्यता पर मुत्तफिक हो जाए. आपने फ़रमाया कि जो इख्तिलाफ है उन्हें मद्दे नज़र रखते हुए जिन चीज़ो पर इत्तेफाक है उन पर ध्यान देना चाहिए.

सैयदना ताहेर सैफुद्दीन रि.अ. अपने अक़ीदे और यक़ीन में रासिख़ थे लेकिन आप दूसरे मज़हब के लोगों के साथ इत्तेफाक और तक़रीब के नज़रिए से पेश आते.

सैयदना ताहेर सैफुद्दीन रि.अ. के वारिस सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन रि.अ. और सैयदना खुज़ैमा कुत्बुद्दीन रि.अ. की इक़्तिदा करके कुत्बी ज्युबिली स्कॉलरशिप प्रोग्राम ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी के साथ २ दिन के लिए तक़रीब कॉन्फरन्स का आयोजन किया. सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. की दोआ मुबारक से यह कॉन्फरन्स कामयाब हुई. (कॉन्फरन्स के बारे में ज़्यादा जानने के लिए यहाँ क्लिक करें.) इस कॉन्फरन्स के बारे में कई ख़बरें अखबारों में छपी. (कॉन्फरन्स के बारे में अखबार देखने के लिए यहाँ क्लिक करें.)

यह कॉन्फरन्स मुस्लेमीन के ओलमा के दरमियान जो इख्तिलाफ है और जिन चीज़ों पर इत्तेफाक है उसके बारे में बहस हो उसका पहला मरहला है. इमाम ने फ़रमाया हैं कि इंसान जिस चीज़ से अंजान होता है उसका दुश्मन होता है. ओलमा के दरमियान इस तरह बहस हो यह बहुत ज़रूरी है. इंशाअल्लाह आइंदा भी ऐसी कोशिशें जारी रहेगी.

सैयदना खुज़ैमा कुत्बुद्दीन रि.अ. ने, आपको माज़ून के रुतबे में ५० साल पूरे होने के अवसर पर, कुत्बी ज्युबिली स्कॉलरशिप प्रोग्राम का इदारा कायम फ़रमाया. आपकी यह उम्मीद थी कि मुमिनीन को इस इदारे से २ तरह के फायदे हों. १) मुमिनीन के फ़रज़न्द उच्च शिक्षा हासिल कर सके और २) शिक्षा इस तरह हासिल करे किअपनी कौम में और दूसरे मज़हबों के दरमियान नज़दीकी बानी रहे.

खुदा तआला हमें यारी और तौफ़ीक़ आता करें कि सैयदना कुत्बुद्दीन रि.अ. की उम्मीदें कुत्बी ज्युबिली स्कॉलरशिप प्रोग्राम में पूरी हों और हुदात किराम और आका मौला त.उ.श. के इरशाद मुताबिक़ हम तक़रीब के नज़रिये से दूसरें लोगों से साथ पेश आए. इंशाअल्लाह इन कोशिशों से खुदा तआला जो लोग इख्तिलाफ पैदा करना चाहते है और फ़ित्नत करना चाहते है उनकी कोशिशों को नाकाम करें.