بسم الله الرحمن الرحيم

وَإِذْ جَعَلْنَا الْبَيْتَ مَثَابَةً لِّلنَّاسِ وَأَمْنًا

हमने इस घर को-काबतुल्लाह को-लोगों के लिए आसरा लेने की जगह और अमान की जगह बनाई है.

(सुरतुल बकरा-१२५)

यह लेख अससैयदुल अजल शहजादा डॉ.अज़ीज़ भाईसाहेब ने सन २०१४ में लिखा है.

ऊपर की आयत में खुदा तआला फरमाते है कि अल्लाह तआला ने काबा को इबादत की जगह और आसरा लेने की जगह बनाई है. इबादत के वक्त मुस्लेमीन का तवज्जोह  काबा की ओर होता है. और काबा के हरम में खून बहाना हराम है, इसलिए मस्जिदे हराम कहते है, जहाँ खून बहाना हराम है.

जिन्हें बैतुल्लाह जाना नसीब हुआ है, वे जानते हैं कि बैतुल्लाह की अज़मत और हैबत को लफ़्ज़ों में समझाना कितना मुश्किल है. इस दुनिया में बैतुल्लाह के सामने खड़े होकर यह लगता है कि मानो खुदा के सामने खड़े हो. खुदा तआला हम सभी को जल्दी हज और उमरा करने का शरफ अता करें, और उसके साथ रसुलुल्लाह स.अ. की ज़ियारत मदीना में नसीब करें.

एक अज़ीमुश शान कसीदे में सैयदनल मोऐयदुश शीराज़ी रि.अ., मुस्तनसिर बिल्लाह इमाम स.अ के बाबुल अबवाब, फरमाते हैं कि :

क्या काबा की हुरमत ज्यादा है जो पत्थर से बने है, या अपने हादी मोहम्मद मुस्तफा की, जिन्होंने इस काबा को बनाया.

सैयदनल मोऐयद अपनी एक मजलिस में फरमाते है कि खुदा तआला ने जिस तरह जिस्म के लिए काबतुल्लाह को पत्थर से बनाया है, जो जिस्म के लिए किबला हैं, उसी तरह खुदा तआला हर ज़मान में एक इमाम को कायम करते हैं जो इमाम नुफ़ूस के लिए किबला है और जिसके ऊपर काबा दलालत करते है,

इमामुज़ ज़मान और सतर में दाई-अल-मुत्लक हकीकी काबा है. जिस तरह हम इबादत करते वक़्त अपने जिस्म से काबा की ओर तवज्जोह करते है, उसी तरह हम अपने नफ़्स से इमाम और दाई की ओर तवज्जोह करते है.

जिस तरह काबा में जिस्मानी हमलों से अमान है और आसरा लेने की जगह है, उसी तरह इमामुज़ ज़मान की दावत नुफ़ूस के लिए इस दुनिया की मुसीबतों से अमान है.

जिस तरह हर मुस्लिम, मुमिन पर अगर इस्तिताअत हो तो हज करना वाजिब है, उसी तरह हर मुमिन पर वाजिब है कि साहेबुज़ ज़मान इमाम और दाई की ओर कस्द करें. इमाम और दाई की ओर अपने नुफ़ूस से तवज्जोह करने की माअना यह है कि उनके बताए हुए रस्ते पर चलना और बेहतर इन्सान बनने की कोशिश करना, ताके हम मलाएकत सिफ़त बन सके.

९ वी ज़िल हिज्जा हजारों मुस्लेमीन अरफा और जबले रेहमत पर जमा होते है. हम खुदा का शुक्र करते हैं कि आज हम मारेफत के अरफा पर खड़े हैं. इमामुज़ ज़मान और आपके दाई की मारेफत करते हैं. अरफा के दिन, हुज्जाज (हज करने वाले) एहराम के कपड़े पहन कर खड़े रहते हैं और ऐसा मन्ज़र नज़र आता है कि मानो कयामत के दिन खुदा के सामने कफन पहने हुए अपने अमलों के साथ खड़े हों. यह मीकात हमें याद दिलाता है कि एक दिन हमें खुदा तआला के सामने खड़ा रहना है और हम यह तैयारी करें कि जब मौत आए तो खुदा के सामने खड़े रहने के काबिल हो.

 सैयदनल मोऐयद अरफा के दिन की दोआ में फरमाते है कि :

" इस घड़ी मैं तमाम हाजी तेरे सामने अरफा पर खड़े है. दुनिया के हर कोने से अलग अलग भाषा और रंग के लोग आए है, धूल से भरे तेरे सामने आए हैं. यह कैसा मन्ज़र है कि कयामत के दिन गोया कफन पहनकर खड़े हो. और तेरे नज़दीक हम इलतिजा करते है तेरी खशियत में,  दीन और दुनिया की उम्मीद और तेरी रहमत की उम्मीद रखते हैं ऐ अरहमर राहेमीन.

ऐ, अल्लाह हम तेरे गुलाम है, और भले ही हम हमारे जिस्म से अरफा से दूर है, मगर हमारे जान और अक़ीदे से वहीं हाजिर है.

तू मोहम्मद और आले मोहम्मद पर सलवात पढ़ और जिस तरह अरफा पर खड़े रहने वालों की ओर तू रहमत की निगाह करता है उसी तरह हम पर रहमत की निगाह कर.”