بسم الله الرحمن الرحيم

صِبْغَةَ اللَّهِ وَمَنْ أَحْسَنُ مِنَ اللَّهِ صِبْغَةً وَنَحْنُ لَهُ عَابِدُونَ

 खुदा का रंग, और खुदा से बेहतर रंग कौन चढ़ा सकता है

 (सूरत उल बकराह : १३८)

करबला के ७२ शोहोदा को बेरहमी से क़त्ल करनेवाला लश्कर दिखावे के खातिर तो “इस्लाम का लश्कर” था। हक के इमाम हुसैन स.अ. ने जिस यजीद को बैअत देने से इनकार किया, उसी यजीद का लश्कर था। यज़ीद के लश्कर में हज़ारों थे, इमाम हुसैन स.अ. के साथ सिर्फ ७२ असहाब थे।

 हमलावर यूँ तो कहने को मुसलमान थे , मगर साहेब उज़ ज़मान को मान ने से उन्हें इनकार था, जो साहेब अपने ज़मान मे रसूलुल्लाह स.अ. के काइम मकाम होते है । साहेब उज़ ज़मान के बदल व़े यजीद को खलीफा मानते थे, जो अबू सुफियान का पोता था और मोअवियाह का बेटा था। (उन दोनों ने इस्लाम के शुरुआत के दिनों में रसूलुल्लाह स. अ. के खिलाफ़ जंग की थी।) 

हम इन शोहोदा को हर मौके पर, हर वाअज़ और हर बयान में, हर मरसिए में याद करते है क्यों कि उन सब ने अपने इख्तियार से, खौफ के बावजूद हक की दावत और इमाम पर फ़िदा होकर वफादारी निभाई, उनका यकीन चरम सीमा पर पहुंचा। उन में से कोई अगर दुनिया की दौलत और आराम चाहनेवाला होता, तो यह कह देना बहुत आसान था कि यजीद का लश्कर भी तो “ला इलाहा इल लल्लाह मोहम्मदुन रसूलुल्लाह” का कलमा पढता है, उन से जेहाद जाईज़ नहीं। मगर दुनिया के खिंचाव और ख्वाहिशो से परे हो कर, करबला के शोहोदा ने हक की राह चुनी और आला मकाम में पहुँच गए। कुछ ऐसे थे जो इमाम का साथ छोड़ गए, व़े दुनिया में बाकी रहे मगर दुनिया की शेहवत (लालच) की ज़ंजीरो में जकड़े रहे। करबला के शोहोदा ने जो क़ुरबानी दे दी उसके सबब उन्हें आखेरत में हुर्रियत (आज़ादगी) और शरफ मिला जिस की अज़मत ख्याल में भी न आ सके ।

गुज़रे कल में किये अमल की शेह शरण ले कर, चर्चा – विवाद से दूर रहना, आँखों के सामने की वास्तविकता का सामना करने को टाल देना बहुत ही आसान विकल्प (इख्तेयार) है – करबला में इमाम हुसैन को छोड़ कर जो लोग चले गये उन के अमल से कुछ ज़्यादा अलग नहीं। खुद को मुसलमान कह कर उन्होने अपना मन मना लिया, और जिसके हाथ में मुल्क और दुनियाभर की सत्ता और जाहोजलाली थी उसे खलीफा मान कर उसको एहेद दे दिया। वह शख्स कितना फासिद (भ्रष्ट) और काज़िब (जूठा) है उस बात को अपने मतलब के खातिर नज़र अंदाज़ कर दिया। जिसकी वजह सिर्फ यह थी कि खुद की आराम की ज़िन्दगी में कोई खलल न हो, और मेहनत उठाने से बचे रहे। करबला के शोहोदा, दुनिया पसंद करू या दीन, उसकी दुविधा में नहीं रहे। बिना किसी का खौफ रखे दीन की रौशनी की तरफ़ बढ़ गए। व़े सब इमाम हुसैन के साथ यकीन और फख्र से रहे।

इमाम हुसैन के चेहलुम के दिनों में उन्हें याद कर के दोआ मांगते है कि हमारी आने वाली नसलें भी हुसैन इमाम को याद करती रहे। लेकिन क्या यह मुनासिब है कि एक तरफ हम इमाम हुसैन को याद करे पर दूसरी तरफ़ जिन उसूलों के खातिर आप ने जान दे दी उन उसूलों को भूल जाएँ?

हम दोआ करें कि आज सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन के कई मोहिब्बीन जो हैरत और असमंजस में है, खुदा उन्हें इस दुविधा से निकलने की हिम्मत अता करे। ये दोआ करे कि उन सभी को ज़ुल्मत के अँधेरे से निकलकर हक़ की रौशनी की तरफ़ आने की हिम्मत मिले ताके ईमान के दायरे में शामिल हो कर सैयदना क़ुतबुद्दीन के शफ़कत के साये में रहे।

हम सैयदना बुरहानुद्दीन को याद हमेशा करते है, आप के वफात का सदमा अभी ताज़ा है । बुरहानुद्दीन  मौला की मोहब्बत हमेशा हमारे दिलो में रहेगी। लेकिन आज उनके वफात के बाद, उनके वारिस को मीसाक दिये बगैर बुरहानुद्दीन मौला की मोहब्बत करते है ये कहना ऐसा है जैसे रसूलुल्लाह स.अ. को तो  मानते है, लेकिन आप के वसी मौलाना अली स.अ. को माने या ना माने इस बात से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे दीन के मुताबिक़ हमें सैयदना बुरहानुद्दीन के सच्चे वारिस को मीसाक देना ज़रूरी है, तब ही सही माने में बुरहानुद्दीन आका की वलायत कबूल होती है ।

हम सब को बचपन से ही करबला और उसके शोहोदा के अमल से क्या सीख मिलती है यह समझाया जाता है । उस सबक को हमे अपनी ज़िन्दगी में कैसे लागू करना है यह अपना इख्तेयार है । अनजान बन कर, सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन आका के जो सही वारिस है और साहेब उज़ ज़मान है, सैयदना क़ुतबुद्दीन पर, बुरहानुद्दीन आका के नाम का दुरूपयोग कर बदकलामी और शारीरिक हमला तक करनेवाले के बद अमल को ख़ामोशी से नज़र अंदाज़ करना है या हमें हक़ के दाई का हिम्मत से साथ देना है ।

हुसैन इमाम के साथ कितनी तादाद है उस गिनती के आधार पर करबला के शोहोदा ने इमाम हुसैन का साथ देने का फैसला नहीं किया था। ये बात उन असहाब को मालूम ही थी। व़े आखेरत की खातिर, इमाम हुसैन को हक़ के इमाम मान कर, इमाम के साथ हुए। जिस वक्त इमाम हुसैन ने मक्का शरीफ से कुफा तरफ़ अपनी आखरी सफ़र शुरू की, उस वक्त फरज़दक आप को रास्ते में मिले जो इमाम के शिया में से थे, और कूफा से लौट रहे थे। इमाम ने फ़रज़दक से कूफा के लोगो की मनोदशा के बारे में पूछा तो फरज़दक ने जवाब दिया की “उन के दिल आप के साथ है, मगर तलवारें आप के ऊपर है"।