بسم الله الرحمن الرحيم

وَلَا يَحْسَبَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا أَنَّمَا نُمْلِي لَهُمْ خَيْرٌ لِّأَنفُسِهِمْ ۚ إِنَّمَا نُمْلِي لَهُمْ لِيَزْدَادُوا إِثْمًا ۚ وَلَهُمْ عَذَابٌ مُّهِينٌ

(सुरते आले इमरान : आयत १७८)

काफेरीन यह न समझे कि हमने जो मोहलत उन्हें दी है वह उनके लिए खैर है, तहकीकन हमने उन्हें मोहलत दी है ताकि वे और गुनाह करे, उन के लिए सख्त अज़ाब है.

यह लेख शेह्ज़ादा डॉ. अज़ीज़ भाईसाहेब कुत्बुद्दीन ने साल २०१४ में लिखा हैं.

हम आशूरा के दिन गुज़री मुसीबत को सदा याद करते है, इस गम से बढ़कर कोई गम नहीं. ऐसी मुसीबत है कि सैयदना ताहेर सैफुद्दीन रि.अ. फरमाते हैं कि हुसैन इमाम पर मेरा हुज़्न हमेशा के लिए हैं.

इमाम हुसैन के चेहलुम पर इमाम हुसैन और आशूरा के बाद आपके हरम पर जो मुसीबतें गुज़री वह हम याद करते है.

हुसैन इमाम स.अ. के वारिस इमाम अली ज़ैनुल आबेदीन और हुसैन इमाम के हरम - मौलातोना ज़ैनब, मौलातोना उम्मे कुलसुम, मौलातोना सकीना और बीबियाँ जो बेवा और यतीम हो गए, उन्हें बंदीवान करके कर्बला से दर बदर  चलाकर कूफ़ा में यज़ीद के आमिल उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद के सामने लाया गया, जिस उबैदुल्लाह ने कर्बला में ७२ शोहोदा के क़त्ल की तम्हीद की थी. उबैदुल्लाह के दरबार में इमाम अली ज़ैनुल आबेदीन और एहले बैत को खुले सर खड़ा किया गया. उबैदुल्लाह ने कहा कि क्या खुदा ने अली को क़त्ल नहीं किया? उसे इमाम अली ज़ैनुल आबेदीन ने अजब शान से कुरान की आयत पढ़कर जवाब दिया कि खुदा तो नफ़्स को वफ़ात देते हैं क़त्ल नहीं करते. जब गुस्से से उबैदुल्लाह ने जल्लाद को हुकुम किया की अली को क़त्ल कर दे तब  अमीरुल मुमिनीन शेरे खुदा की शेह्ज़ादी मौलातोना ज़ैनब, इमाम की हिमायत में आप के आगे आकर खड़ी हो गई और हिम्मत से कहा कि अगर तू अली को क़त्ल करना चाहता है तो तुझे पहले मुझको क़त्ल करना होगा.

हुसैन इमाम के हरम को यज़ीदी लश्कर फिर कूफ़ा से शाम चलाकर या  नंगी पीठ के ऊँट पर बिठाकर ले गए. काफ़िला तरक़ीबन ९०० किलोमीटर का फासला तय करके यज़ीद के दरबार में पहुँचा. जब काफ़िला शाम के अंदर दाखिल हुआ तो कर्बला के शोहोदा के सरों को भालों की नोक पर बलन्द किया गया और एहले बैत को शाम के बाज़ार में चलाकर यज़ीद के दरबार में लाया गया. उसके तख़्त के सामने हुसैन इमाम का रास मुबारक रखा गया. उस वक्त मौलातोना ज़ैनब ने एक अज़ीमुश शान खुत्बा पढ़ा जिसे  सुनकर  यज़ीद की मजलिस हिल गई. आपने मौलातोना फ़ातेमा और अमीरुल मुमिनीन की शानात की ज़िक्र फ़रमाई. इस ख़ुत्बे का एक हिस्सा नीचे पेश किया गया है. एहले बैत को शाम में कई महीनों तक कैद में रखा गया ताकि एक लम्बे समय के बाद वे मदीना पहुँचे.

इमाम अली ज़ैनुल आबेदीन और एहले बैत की मुसीबत की ज़िक्र लिखने से क़लम में लर्ज़िश पैदा होती है. कर्बला के बाद क्या क्या मुसीबतों पर सब ने  सब्र किया. उनका सब्र और उनकी हिम्मत तमाम लोगों के लिए एक मिसाल है.

इमाम अली ज़ैनुल आबेदीन को कई महीनों तक कैद में रखा लेकिन आपको, इमामुज़ ज़मान को, वे क़त्ल न कर सके. ज़ैनुल आबेदीन इमाम के साथ मोहम्मदुल बाकिर इमाम भी कर्बला में हाज़िर थे और आपको भी दुश्मनों ने एहले बैत के साथ कैद किया. यह सबसे बड़ी दलील है कि दुश्मन चाहे जितना ज़ुल्म करे लेकिन इमामत का सिलसिला क़यामत तक बाक़ी है.

आज हम यकीन के साथ मानते है कि कर्बला में कौन हक पर था और कौन नहीं और इन मुसीबतों के बावजूद हक ग़ालिब हुआ ये भी जानते है. आज जब हम खुद फितनत के तूफ़ान से गुज़र रहे है, तब हमें सही और गलत, हक़ और बातिल को पहचानना ज़रूरी है. ऐसे वक्त में हम मौलातोना ज़ेनब अ.स. के अमल से सबक लेते है. आपने यज़ीद के भरे दरबार में, खुले सर मज़लूम रहते हुए भी, खुदा पर तवक्कुल रखकर बेमिसाल हिम्मत से यह कहा कि तू तेरा नाक ऊँचा करके, तेरे चारो तरफ दुनिया के ज़खारिफ देखकर खुश हो रहा है. लेकिन होशियार यह तो खुदा के अज़ाब के पहले की मोहलत हैं. खुदा तआला ने फ़रमाया हैं कि काफेरीन यह न समझे कि हमने जो मोहलत उन्हें दी है वह उनके लिए खैर है, तहक़ीकन हमने उन्हें मोहलत दी है ताकि वे और भी गुनाह करे, उन के लिए सख्त अज़ाब है.  फ़ितनत के इस ज़मान में यह लाज़िम है कि हम भी खुदा पर तवक्कुल रखें. यह यक़ीन रखना लाज़िम हैं कि खुदा अपने नूर के मुतिम हैं. यह हिदायत का नूर हमारे नफ़्स के लिए रौशनी है जो ज़िन्दगी की सफर में हमें सिराते मुस्तक़ीम पर साबित रखता हैं.

जो इमाम हुसैन और आपके असहाब और एहले बैत का सब्र और आपकी हिम्मत को याद करके हम अपना हौंसला बलन्द न करें, हमारे अज़म को  मोहकम न करे  कि हम भी हक़ की हिमायत में खड़े हों, तो और कैसे करेंगे?