بسم الله الرحمن الرحيم

أَيَوَدُّ أَحَدُكُمْ أَن تَكُونَ لَهُ جَنَّةٌ مِّن نَّخِيلٍ وَأَعْنَابٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ لَهُ فِيهَا مِن كُلِّ الثَّمَرَاتِ وَأَصَابَهُ الْكِبَرُ وَلَهُ ذُرِّيَّةٌ ضُعَفَاءُ فَأَصَابَهَا إِعْصَارٌ فِيهِ نَارٌ فَاحْتَرَقَتْ ۗ كَذَٰلِكَ يُبَيِّنُ اللَّهُ لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَتَفَكَّرُونَ *

 (सूरत अल बकरा : २६६)

क्या तुम मे से किसी को गवारा होगा की उसका एक बाग़ हो, जिसमे खजूरी के दरख्त हो और अंगूर के बेल हो, और जिसके तहत झरने बहते हो, और कई तरह के फल हो, और जब बुढापा आए, बच्चे अभी इतने काबिल न हो (की खुद की देखभाल कर सके) तब एक हवा ऐसी चले जिसमे आग जैसी गर्मी हो, और तमाम बाग़ को जला दे, क्या खुदा अपनी आयत वाज़ेह नहीं करता, की तुम उसमे तफ़क्कुर करो (सोचो)

१८ व़े इमाम मुस्तन्सिर बिल्लाह के बाब अल-अबवाब, सैयदना मोअय्यदुश शिराज़ी फ़रमाते है कि इस आयत मे इमाम हुसैन पर करबला मे जो मुसीबत उतरी उसकी ज़िक्र है – क्या तुम्हे ये पसंद न होगा के ऐसी कोई मुसीबत तुम्हारे या तुम्हारे करीबी लोगो पर न आये । 

इमाम हुसैन और आप के एहले बैत और असहाब की मुसीबत की याद सदीओं से होती रही है । इमाम हुसैन और आप के एहले बैत पर करबला मे जो मुसीबत उतरी उसका गम हम हुसैन की मोहब्बत के सबब करते ह। हमारे दिल मे जिनकी मोहब्बत होती है, जब उन पर कोई मुसीबत उतरे, तो जैसे खुद पर वह मुसीबत उतर आई हो ऐसे हुज़ुन (गम) होता है, और अगर बहुत ही प्यारे हो तो अपनी मुसीबत से भी ज़्यादा गम होता है, ये मोहब्बत की निशानी है। हुसैन इमाम हमारे इमाम है, हमारे अजीमुश शान नबी मोहम्मद रसूलुल्लाह स.अ. के नवासे है, खुदा के वली, मुश्किल कुशा आका अमीरुल मुमिनीन स.अ. और मौलातुना फातेमा स.अ. के शेहजादे है । मजलीस मे, वाअज़ मे, मर्सिये मे जब हम ज़िक्र सुनते है कि खुद को मुसलमान कहलाने वालों ने अपने ही नबी के एहले बैत को बेरेहमी से क़त्ल कर दिया, तो हमारे दिल पिघल जाते है और आँखों से आंसू ऐसे टपकते है जैसे खुद ही पर ये मुसीबत गुजर रही हो । जब हम इन ज़िकरों को सुनते है कि यजीद के लश्कर ने ३ दिन एहले बैत को पानी का कतरा नहीं दिया; ६ महीने के अली असगर भी ३ दिन के भूखे प्यासे शहीद हो गए; इमाम हुसैन ने अपने असहाब को आशूर की रात, आने वाले रोज़ खुदा की राह में फ़िदा होने किस तरह हिम्मत बंधाई, अब्बास अलमदार ने सकीना को पानी जल्दी पहुचाने के खातिर फ़ुरात अपने सामने होने के बावजूद पानी का एक कतरा न चखा वो ज़िक्र; हुसैन इमाम ने अपने नौजवान फ़र्ज़न्द अली अकबर का सर गोद मे लेकर मुमिनीन को अपनी आखरी घड़ीओ में क्या सआदत  हांसिल होती है उसकी बिशारत देने की ज़िक्र; हुसैन इमाम ने अपने ६ महीने के फरजंद अली असगर को हाथ पर ऊँचा किया और दुश्मनों ने अली असगर के गले मे तीर मारा वो ज़िक्र; हुसैन इमाम ने बहन जैनब और उम्मे कुलसूम को फरमाया कि हरम से कहे कि सब डबल सबल कपडे पहन ले वो ज़िक्र; जैनब का दूर से देखना की माँ जाया भाई हुसैन के रास मुबारक को बदन ए अतहर से शिमर जुदा कर रहा है वो ज़िक्र; दुश्मन रसूलुल्लाह स.अ. के घराने की बीबी साहिबा और बच्चों को गुलामों की तरह और बच्चों के हाथों को रस्सी से बाँध कर सहरा की तपती धुप में चला रहे है और अली जैनुल आबेदीन इमाम की गरदन में और हाथ पाओं में जंजीरें पहना कर खुले पाओं चलाते है ये सब ज़िक्र सुन कर हम अपने खुद के जिस्म पर ऐसी मुसीबत उतरे उस से ज़्यादा रोते है । सैयदनल मोअय्य्दुश शिराज़ी ने फरमाया है कि मुमिन का अपने रूहानी माँ बाप से जो रिश्ता है वह उसके जिस्मानी माँ बाप के रिश्ते से गहरा है और सदा के लिये है । इमाम मुमिनीन के रूहानी बावा है; ये अपना घर नहीं ये नबी का घराना है । ये हुसैन इमाम है कि जिस इमाम ने इस्लाम और नबी की उम्मत के खातिर, अपने नाना नबी के दीन के खातिर, और अपने बाद क़यामत के दिन तक आने वाले मुमिनीन की खातिर अपना सब कुछ कुरबान कर दिया।

हुसैन इमाम और आप के एहले बैत और असहाब ने जो दुनिया के वास्ते मिसाल काइम की है उसकी कोई तुलना नहीं है और शब्दों से उसकी तारीफ़ या शुकर मुमकिन नहीं है । इस वाकिए ने इतिहास की राह बदल दी और सिर्फ उतना ही नहीं, क़यामत के दिन तक आने वाले मुमिनीन की नस्लें  और दावत आबाद रहेगी यह तदबीर कर दी । सिर्फ एक और वली थे जिन्होंने इस मिसाल को दोहराया, हुसैन के दाई सैयदना क़ुतबुद्दीन शहीद रि.अ., जिन्होंने हुसैन की तरह सतर की दावत के खातिर, इमाम उज़ ज़मान की दावत के खातिर, शहादत ली। आप हक के खातिर ज़ुल्म और जूठ के खिलाफ अडग रहे। आज हमारे दाई सैयदना क़ुतबुद्दीन त.उ.श. जिनको सैयदना ताहेर सैफुद्दीन रि.अ. ने सैयदना क़ुतबुद्दीन शहीद रि.अ. का लकब देते वक्त ये कहा की व़े कुत्बुद्दीन शहीद की बरकत उन्हें देना चाहते है।

आप इमाम हुसैन ने जो करबला मे और सैयदना क़ुतबुद्दीन शहीद ने एहमदाबाद मे जो मिसाल काइम की उसकी इक्तेदा कर रहे है। आप कई मुश्किलों के बावजूद, जूठ जोहुक्मी, और ज़ुल्म के खिलाफ खड़े है । इमाम उज़ ज़मान की दावत के खातिर, मुमिनीन के खातिर, और दाउदी बोहरा कौम की पहचान और अस्तित्त्व के खातिर आप संघर्ष कर रहे है। दावत की खेती का जतन बहुत ही शफ़कत से साबिक  दोआत मुत्लकीन  ने किया है खासकर ५१ व़े दाई सैयदना ताहेर सैफुद्दीन रि.अ. और ५२ व़े दाई सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन रि.अ. ने इसे संवारा है ।

सैयदना खुज़ैमा क़ुतबुद्दीन त.उ.श. अजब शान से दारुस सकीना मे, अशरा मुबारका के अय्याम मे वाअज़ फरमा रहे है । हर एक वाअज़ एक किताब है और हक्क की एक आयत – सच्चाई का सबूत है । आप की तुलना ऐसे लोगो के साथ नहीं की जा सकती जो खुद को वाएजीन बताते है मगर तख़्त पर बैठ कर ऐसी असभ्य भाषा का प्रयोग करते है कि जिसका प्रयोग सड़क पर भी उचित नहीं। सैयदना खुज़ैमा क़ुतबुद्दीन त.उ.श. ने बहुत ही विस्तार से मनसूर इमाम ने उत्तर अफ्रीका में दज्जाल पर हुइ फतह की ज़िक्र की । इमाम मनसूर ने मुमिनीन और अन्य लोगो को दज्जाल के कब्ज़े में से छुड़ाने की मोहिम के दौरान कई मुश्किलों को झेला। इमाम मुसलसल १० साल तक जंग करते रहे। लड़ाई के कई सालों  बाद आप ने अपने शेहजादे और वारिस इमाम मोइज़ को ख़त लिखा। इमाम मोइज़ मेह्दिय्या में तशरीफ़ रखते थे जो ममलकत का दारुल हुकूमत था। मनसूर इमाम ख़त में फरमाते है कि “मैं ये अमल कर रहा हूँ सिर्फ ये नीयत से खुदा की ख़ुशी हांसिल हो, रसूलुल्लाह की आल के ममलकत की बेह्जत और बहा के खातिर, इस से (जंग) ज्यादा कोई वेह्शत (अकेलापन) नहीं है और कुर्बत (मुसीबत) नहीं है, मगर खुदा की राह में ये मेहनत बहुत ही कम, बहुत ही कम है; खुदा ने जो मेरे लिये मुक़र्रर किया है उस पर शुकर करता हूँ, खुदा मेरा आसरा है और खुदा पर मुझे भरोसा है”। इमाम के लश्कर ने आखिर मे जब दज्जाल को पकड़ लिया, तो इमाम ने उसकी ऑर देखकर फरमाया कि,  “खुदा ने हिकमत से जो अमल किया है, क्या तू नहीं देख रहा है ? खुदा ने हक्क और सच्चाई को बुलंद किया गरचे उसकी मदद पर बहुत कम थे और जूठ और बातिल को मिटा दिया गरचे उसके मददगार बहुत थे”। सैयदना ताहेर सैफुद्दीन रि.अ. ने कई कोर्ट केसों का सामना किया, इनमे से अक्सर केस दुश्मनों ने आप पर दायर किये, कुछ आपने ने भी उनके खिलाफ दायर किये, खुदा ने सैयदना ताहेर सैफुद्दीन को फ़तेह मुबीन अता की। सैयदना ताहेर सैफुद्दीन ने फरमाया कि, “दुश्मनों के एक के बाद एक कई हमले मुझ पर हुए, पर मुझे शिकवा नहीं है, बलके मैं खुदा का शुकुर करता हूँ, क्योंकि इन सब मुश्किलात में मुझे हक्क के खातिर जेहाद करने का सवाब हांसिल होता है ।

अब अमल करना हमारे अपने हाथों में है मुमिनीन, जो दाईज़ ज़मान सैयदना खुज़ैमा कुत्बुद्दीन त.उ.श.  को मोहब्बत करते है, हमारे रूहानी बावा की तरह – दाई मुमिनीन के रूहानी बावा है ये ज़िक्र सैयदना हातिम रि.अ. ने की है। हम पर है के हम, इन दिनों जब मोहब्बत के जज़्बे में हुसैन पर आंसू बहाते है, और हुसैन के दाई की सच्ची मोहब्बत करते है, आज के इन मुश्किल हालात में हुसैन के दाई का साथ देकर दावत की खिदमत यकीन और इखलास से करे। हम जो भी अमल इस नीयत से करेंगे, उसके आगे चल के बेहतर नतीजे आयेंगे क्योंकि यह शुरूआती और रचनात्मक दौर है। दाइज़ ज़मान हमे हक्क की राह दिखा रहे है । अशरा मुबारका के दिनों मे, खासकर आशूरा के दिन इमाम हुसैन की कुरबानी याद करते हुए, हुसैन के दाई जिस हिम्मत से अमल फरमा रहे है, उस राह को अपना कर, आप से सबक लेकर, दावत उल हक़ और दाई की हिमायत के खातिर खिदमत करें, ताके हमारी आनेवाली पीढ़ीयों का और कौम का भविष्य सलामत रहे।