بسم الله الرحمن الرحيم 

من بكى او ابكى او تباكى على ولدي الحسين وجبت له الجنة

मन बुका अव अबका अव तबाका अला वलदी अल हुसैन वजबत लहू अल जन्नाह

हदीस रसूलुल्लाह स.अ.

मेरे नवासे हुसैन पर जो रोएगा, रुलाएगा, या गम का इज़हार करेगा, उस के किये जन्नत वाजिब (निश्चित) है

मोहर्रमुल हराम के पहले दस दिन (अशरा मुबारका) अपने नबी मोहम्मद स.अ. के नवासे इमाम हुसैन अ.स. और आप के साथ आपके एहले बैत और ७२ असहाब ने करबला के रन मे बेजोड़ अज़म और कुरबानी की मिसाल काइम की, वह याद ताज़ा करना के दिन है । उस ज़मान के हुक्काम के ज़ुल्म, नाइंसाफी, खौफ और अत्याचार के खिलाफ़ जेहाद मे व़े सब कुरबान हो गए। इमाम हुसैन का काफिला २ रि मोहर्रम सन ६१ हि. (इसवी सन ६८०) के रोज़ करबला पोहंचा, दस दिनों तक दुश्मनों का सामना किया, और आशूरा के रोज़ भूखे प्यासे शहीद हुए।

मोहर्रम के पहले दस दिन दुनिया भर के शिया मुस्लिमो के लिये अपने अकीदे (मान्यता) को ताज़ा करने के दिन है। दुनिया भर के मुमिनीन इन दिनों मे मस्जिदों और मर्कज़ों मे जमा होते है। मोहर्रम की २ रि तारीख से वाअज़ होती है जिस मे दावत की तारीख, दीन की फलसफत, रिवायत, अदब की ज़िक्र होती है, जो नबी स.अ. के एहले बैत और असहाब की शहादत की ज़िक्र, बुका और मातम पर तमाम होती है । मुमिनीन के ये इज्तेमा और मजलीस आशूरा के दिन तमाम होती है, जिस दिन पूरे दिन फजर से शाम लग वाअज़ और इबादत होती है ।

पिछले ९०० साल से, फातेमी इमाम मिसर में और यमन और हिन्दुस्तान के दोआत मोहर्रम मे अज़ा की मजलीस काइम करते आए है । ख़ाससतन ५१ व़े  और ५२ व़े दाई वाअज़ में शामिल होने के लिये मुमिनीन को ताकीद फरमाते, ताके हमारे ईमान को ताजगी मिले और हक का इल्म ज़्यादा हांसिल हो, और इस नेक अमल से इस्लाम के नए साल की शुरुआत हो।

 

ज़िक्र और तफ़क्कुर (याद और चिंतन) मोहर्रम का उद्देश्य भाग १ (भाग २ अगले अंक में)

रसुलुल्लाह स.अ. की हदीस (लेख के शुरुआत में) के मुताबिक इमाम हुसैन स.अ. की ज़िक्र और बुका करनेवाले पर जन्नत फ़र्ज़ है। इमाम हुसैन की मुसीबत और कुरबानी की याद हमें दुन्यवी मश्गुलियत से दूर कर, हमारे दीन के बारे में गौर और फ़िक्र (चिंतन) की तरफ़ लाती है । इमाम हुसैन ने जिस मकसद के खातिर अपनी जान और एहलो अयाल सब कुरबान कर दिया, उसकी याद दिलाती है । इमाम हुसैन ने हक़ और सच्चाई के खातिर और खुदा तआला के वादे पर पूरा एतेमाद कर सब कुछ सह लिया। एक रिवायत है कि करबला की तरफ़ बढ़ते आप ने अपने शेहजादे मौलाना अली जैनुल आबेदीन को अगली रात मे देखे सपने की ज़िक्र की कि एक आवाज़ आई कि आप “चल रहे है और मौत आप को जन्नत की तरफ़ ले जा रही है”। ये सुन कर जैनुल आबेदीन ने अर्ज़ की “क्या हम हक़ पर नहीं है?”, हुसैन इमाम ने फरमाया “यकीनन हम हक पर है”, जैनुल आबेदीन ने फिर अर्ज़ की “तो फिर मौत की क्या फ़िक्र है” (इज़न ला नुबाली बिल मौत)

हमारे हुदात किरम की करबला की ज़िक्र की इस खैर रसम के सबब, इमाम हुसैन स.अ. की मुसीबत के उन दिनों की याद हमारे दिलो में ताज़ा हो जाती है, और हम अपनी हद में, हक के खातिर जाँफेशानी का सबक हांसिल करते है ।


तजदीद (ताज़गी) मोहर्रम का मकसद भाग २ (सिजिल्ल की अगली किश्त में शाए होगा इन्शाअल्लाह)।