इस्लाम मे अज़ान की आवाज़ नमाज़ के लिये बुलावा है । हर रोज़ फरिज़त की नमाज़ के पहले हम अज़ान में शहादत देते है कि “नहीं है कोई खुदा मगर अल्लाह तआला, मोहम्मद (स.अ.) अल्लाह के रसूल है और मौलाना अली (स.अ.) अल्लाह के वली है।“ मेराज के वक्त ( शेहरे रजब की २७ वि रात, जब रसूलुल्लाह स.अ. रूहानियत से ७ आसमान की ऑर सिधारे) उस वक्त रसूलुल्लाह को अज़ान बताई गई। एक ज़िक्र है कि रसूलुल्लाह जिब्रईल के साथ थे तब एक फ़रिश्ता नज़र आये, जो की उस वक्त आसमान में पहली और आखरी बार नज़र आये। उस फ़रिश्ता ने जिबईल को बताया और जिब्रईल ने रसूलुल्लाह को बताया की यह फ़रिश्ता इस तरह अज़ान देने को कह रहे है । उस फ़रिश्ता ने खुदा के हुक्म से रसूलुल्लाह को अज़ान बताई। रसूलुल्लाह स.अ. ने हमेशां इसी तरह अज़ान दी और आज हम भी उसी तरह अज़ान देते है ।

जिस वक्त इमामैन हसन और हुसैन की विलादत हुइ तो रसूलुल्लाह स.अ. ने दोनों के दाहिने कान में अज़ान दी और बाएँ कान में इकामत दी। हम भी जब फरजंद की विलादत होती है तो उसी तरह अमल करके उसके दाहिने कान में अज़ान और बाएँ कान में इकामत देते है ।

हमारे जान पर अज़ान का गहरा असर होता है – अज़ान हमारे अकीदे को मज़बूत करता है। दुश्मन अज़ान सुन कर कांप जाते है और शैतान अज़ान सुनकर भाग जाता है ।

शेह्रुल्लाह के मुबारक महीने में इस सिजिल्ल के अंक में मिसरी लेहेन में शेह्ज़ादा डॉ. हुसैन भाईसाहेब ने दी हुइ अज़ान की रेकोर्डिंग पेश करते है ।