"मुमिनीन, कुराने मजीद लेकर कहता हूँ, खुदा की कसम हम जन्नत में पहुँचेंगे" - सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. की अशरा मुबारका १४४१ हि. की दूसरी वाअज़. 

कुराने मजीद खुदा तआला के कलामे पाक है. कुरान की कसम सबसे ऊँची कसम है. आज सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. ने कुराने मजीद के कसम खाकर मुमिनीन को फ़रमाया कि “मुमिनीन, यह कुराने मजीद लेकर कहता हूँ कि खुदा की कसम हम जन्नत में पहुँचेंगे.” यह मंज़र देखकर मुमिनीन को एक नूरानी मंज़र याद आया जब सैयदना कुत्बुद्दीन रि.अ. ने पांच साल पहले कुराने मजीद को हाथ में लेकर फ़रमाया कि आप बुरहानुद्दीन मौला के मन्सूस है.

आज अशरा मुबारका १४४१ हि. की दूसरी वाअज़ में सैयदना त.उ.श. ने अजब शान से मुमिनीन को दावत की तारीख, हज़ारों साल की तारीख की एक झलक दिखलाई और सफ़ीनतुन नजात की हकीकी माना बयान फ़रमाई.

“नूह का सफीना”, यह किस्सा सब जानते है कि नूह नबी अ.स. ने एक सफीना बनाया और अवाम जो कहती है कि सफ़ीने में हैवान के हर जिंस में से एक एक जोड़े को इस सफ़ीने में सवार किया. यह सफीना एक तूफ़ान में चला और जूदी पहाड़ पर रुका. उसके बाद नूह ने दुनिया के अंदर इन हैवान के जिंस को दुबारा बसाया. यह मशहूर रिवायत है. लेकिन इसे ज़ाहिर में अकलमंद कैसे कबूल करे. सैयदना ने फ़रमाया कि यह तो मुमकिन नहीं कि नूह ऐसा सफीना बनाएँ जिसमें हैवान के हर जिंस में से एक जोड़ा बस सके. तो यह कौल सही कैसे हुआ? यह सही तो है ही क्योंकि यह खुदा का कौल है. तो उसकी माना, उसका तावील का होना वाजिब है. तावील क्या है कि नूह नबी को सफीना बनाने का हुक्म आया, यानी आप अपने वसी को कायम करें. तूफ़ान की माना वसी के हासेदीन की फ़ितनत. तो जो सफ़ीने में सवार हुए यानी जिन्होंने वसी को माना वे जीत गए और दूसरे गरक हो गए, डूब गए.

सैयदना ने फ़रमाया कि इस तरह की फ़ितनत केवल नूह के ज़माने में नहीं हुई है, बल्कि नूहुद दौर रसुलुल्लाह के ज़माने में भी हुई. ग़दीरे खुम में आपने अमीरुल मुमिनीन पर नस्स फ़रमाई, उसके बाद जिन्होंने आपको “मौला” कहकर मुबारकबादी दी उन्होंने आपकी दुश्मनी की. इकरार के बाद इन्कार किया.

सैयदना ने जज़्बे से फ़रमाया कि सफ़ीनतुन नजात हमेशा जारी रहा है और रहेगा. जितने भी फ़ितनत के मौज आए. आपने मिसाल बयान फ़रमाया कि हुसैन इमाम मौलाना अली ज़ैनुल आबेदीन को आपके साथ करबला ले कर गए. जो लोग इमामत का नूर बुझाने पर तुले हुए थे वे नाकामियाब हुए. जो तलवार हुसैन इमाम पर चलाई वही तलवार ज़ैनुल आबेदीन इमाम पर भी चला सकते थे. लेकिन वे ऐसा न कर सके, खुदा का नूर नहीं बुझा पाए.

सैयदना ने फ़रमाया कि तीसरे दाइल मुत्लक सैयदना हातिम रि.अ. के ज़माने में सैयदना ज़ोएब का पोता हसन बिन मोहम्मद दुश्मन बना. लईन जाफर की फ़ितनत के वक्त मुमिनीन पर बहुत मुसीबतें और मुश्किलें आई. सैयदना दाऊद बिन कुतुबशाह रि.अ. के ज़माने में सुलैमान ने सैयदना दाऊद का पहले इकरार किया मगर उसके बाद दावा करके फ़ितनत शुरू की. सैयदना त.उ.श. ने फ़रमाया कि आज जिन लोगों ने सैयदना कुत्बुद्दीन की दुश्मनी की, वे पहले सैयदना बुरहानुद्दीन के ज़माने में यह मानते थे कि आप सैयदना बुरहानुद्दीन के मन्सूस है. सजदा करते थे. यह इब्लीसियत नहीं तो क्या है? पहले इकरार फिर इन्कार. उसी तरह हर ज़मान में फ़ितनत होती है. आदम नबी अ.स. के ज़माने से आज तक. शाकेलत यह होती है कि हर ज़मान में जो हसद करने वाले होते है वे हक़ के धनी की दुश्मनी करते है और सफ़ीनतुन नजात को डुबाने की कोशिश करते है. लेकिन सफ़ीनतुन नजात, अवलिया उल्लाह का सिलसिला साबित है. सैयदना ने फ़रमाया कि हक़ के दरवाज़े हमेशा खुले हुए है. वाअज़ में आपने जो इस फ़ितनत के तूफ़ान में डूब गए है उनके लिए दोआ फ़रमाई कि वे फिर से सफ़ीनतुन नजात में सवार होकर नजात हासिल कर ले.

सैयदना ने बयान में इरशाद फ़रमाया कि अकल के सबब मख़लूक़ात के दरमियान इंसान की मीज़त है. अकल के सबब इंसान ऐसी चीज़ो पर आगाह हो सकता है जिसपर दूसरे मख़लूक़ात नहीं हो सकते. अकल के कारण इंसान यह समझ सकता है कि दुनिया की ज़िन्दगी हमेशा के लिए नहीं, मौत तो आएगी ही. तो अकल इस्तेमाल करे, इल्म पढ़ें, और जो लोग कहते है कि सवाल करना कुफुर है उनसे दूर हो जाए. सैयदना ने मिसाल फ़रमाया की यदि एक यंत्र खराब हो जाए तो उसकी कीमत उसके लोहे जितनी है. यदि इस दुनिया में इंसान के वुजूद में आने का मकसद सिर्फ खाना पीना होता तो उसे खुदा उतनी ही समझ देते. खुदा ने अकल की कुव्वत अता फ़रमाई है ताकि इंसान अकल इस्तेमाल करके इख़्तियार कर सके.

हम मुमिनीन की खुश नसीबी है कि हम सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. के ताबेईन है, जिनकी मोहब्बत के सबब हम सफ़ीनतुन नजात में सवार है. नजात हमारे लिए है.

सैयदना ने शहादत का बयान सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन रि.अ. के मरसिये “फुलकुल हुसैन बे करबला” से शुरू फ़रमाया और मौलाना अली असगर और इमाम हुसैन की शहादत पढ़ी.