आका मौला सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. ने खिताब कर के फरमाया कि ऐ फातेमतुज ज़ाहरा की मोहब्बत रखने वाले मुमिनीन, फातेमा के किब्लागाह मोहम्मद रसूलुल्लाह स.अ. की उम्मत खास्सा ! फातेमा के शौहर कुदसी जौहर अलीयुल मुर्तजा के शिआ खोलोसा ! मौलातुना फातेमा के दो शेहज़ादे हसन और हुसैन की मोहब्बत करनेवाले मुमिनीन। पंजेतन स.अ. की तस्बीह सुबह शाम करनेवाले तुम हो मुमिनीन ।

पंजेतन स.अ. के अज़ीम मकाम की सैयदना ने ज़िक्र फरमाई जो सैयदना हातिम आप की किताब ‘तोह्फ़तुल कुलूब’ में बयान फरमाते है। रसूलुल्लाह स.अ. पंजेतन की शान बयान करते है, खुदा ने फातेमा का नूर किंदील के मिसल अर्श के कुर्त पर पैदा किया, इस नूर के सबब ज़मीन और आसमान रोशन हो गए, इस वजह से फातेमा का नाम ज़ाहरा है।

मौलाना त.उ.श. ने इस आयत की ज़िक्र फरमाई : रसूलुल्लाह स.अ. को खुदा तआला फरमाते है “कहो कि मैंने जो हिदायत दी उसका तुमसे कोई अजर (मुआवज़ा) नहीं मांग रहा हूँ । सिर्फ यह चाहता हूँ कि मेरे कराबत के लोग की मोहब्बत करना। सैयदना ने वाज़ेह कर के फरमाया कि कराबत से मुराद अली, फातेमा और फातेमा के फरजंद आइम्मत फातेमियीन है।

आका मौला ने मौलातुना फातेमा की चादर का मौजिज़ा बयान फरमाया, फातेमा की चादर यानि फ़ातेमा की दावत। इमाम केह्फुत तकीयत में सिधारे मगर फातेमी दावत काइम है। इमामत के सूरज का नूर, दोआत जो चंदरमा के मकाम में है, उस नूर की तलक्की कर के मुमिनीन की तरफ पहुंचा रहे है। दाई फातेमी दाई है । मौलाना ने एक ज़िक्र बयान फरमाई कि एक अंग्रेज़ इतिहासकार ने एक मुखालिफ को मुंह तोड़ जवाब दिया कि जगत में आज फातेमियीन अइम्मत की नामना बाकी है तो सैयदना ताहेर सैफुद्दीन के सबब।

दोआत की शान के बारे में बयान आया कि वे गोया इमाम है। दाई की मोहब्बत करे तो इमाम और पंजेतन की मोहब्बत कबूल है। मोहब्बत है तो जन्नत है। मौलाना त.उ.श. ने ज़ियादिल अस्वद की ज़िक्र फरमाई, जो पैदल लम्बी सफर कर के इमाम बाकिर स.अ. की हज़रत में पहुंचे, इमाम ने फरमाया कि नहीं दीन मगर मोहब्बत !

सैयदना त.उ.श. ने फरमाया कि इमाम हुसैन की मोहब्बत हमें इस मजलीस में खींच लाती है। कयामत के दिन मौलातुना फातेमा इमाम हुसैन पर रोएगी वह मंजर बयान किया।

मौलातुना फातेमा की शानात की ज़िक्र सैयदना ने फरमाई ।

रसूलुल्लाह स.अ. मौलातुना फातेमा को बोसे देते, आप की खुश्बो लेकर फरमाते की फातेमा से जन्नत की खुश्बो मेहेकती है, फातेमा की विलादत जन्नत के तुफ्फे (सेब) से हुइ है। फातेमा लैलतुल कदर  की मम्सूला है। मौलातुना फातेमा की एहेम फज़ीलत यह है कि रसूलुल्लाह स.अ. फरमाते है कि फातेमा आप पर मेरा जान कुरबान है । फातेमा आलमीन के निस्वान की सैयेदा है।

सैयदना त.उ.श. ने मौलाना अली और मौलातुना फातेमा की शादी की ज़िक्र फरमाई । सैयदना इदरीस इमादुद्दीन फरमाते है कि यह शादी रूहानियत और जिस्मानियत में हुइ, पहले आसमान में फिर ज़मीन में हुइ। इब्ने हजर, एहले बैत का दुश्मन भी ज़िक्र करता है कि रसूलुल्लाह स.अ. ने फरमाया कि मैं खुश क्यों न होऊं जब कि इस शादी के सबब मेरी उम्मत के मर्द और औरतों को आग से आज़ादगी नसीब हुइ।

पंजेतन स.अ. के नाम खुदा तआला के नाम से मुश्तक है, यह ज़िक्र मौलाना ने फरमाई ।

सैयदना इदरीस ने मौलातुना फातेमा के नामो का आला बयान फरमाया वह ज़िक्र की।

सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन ने १४२२ हि में अमेरिका में अशरह की वाअज़ में ज़िक्र फरमाई, आप के बयान में से नादिर जुमले सैयदना फखरुद्दीन ने अदा किए।

मौलातुना फातेमा के आसमान में दो नाम और ज़मीन में चार नाम। हमारे से ज़्यादा करीबतर है बाब और हुज्जत, दाई और माजून।

एक वजह में इमाम और हुज्जत फ़ातेमा के नाम है, इमाम फातेमी और इमाम के हुज्जत भी फातेमी, हुज्जत भी फिर इमाम बनते है।

दाई कौन फातेमी दाई, फ़ातेमा के नाम, फ़ातेमा की मारेफ़त करनेवाले दाई है, फ़ातेमा की दावत कौन काइम करता है कि दाई अल मुतलक और आप की मुवाज़रत, खिदमत माज़ून करते है। तो दाई और माज़ून दोनों ही फ़ातेमा के नाम है। दाई और माज़ून यह बताते है कि इमाम और  हुज्जत के हम ताबे ए फरमान है, उनके हम खिदमतगुज़ार है, उन दोनों की दावत तैयेबियाह, फातेमीयाह काइम करने वाले दाई और माज़ून है।

मौलाना त.उ.श. ने फरमाया कि बुरहानुद्दीन आका के माज़ून कौन थे? तुम सब जानते हो ना? बावाजी साहब सैयदना कुत्बुद्दीन। दाई ने खुद अपनी ज़िक्र के साथ किस शान से अपने माज़ून की ज़िक्र फरमाई । सूरज चमक रहे हो मगर आँखों पर पट्टी बाँध लेते है, देखते हुए भी अंधे हो जाते है।

माज़ून की दावतुस सतर में शान बलंद है। यह रुतबे का नाम माज़ून अल मुतलक है। दाई को आप पर पूरा भरोसा है।

सैयदना हातिम रि.अ. फरमाते है कि दाई रूहानी बावा और माज़ून रूहानी माँ के महल में है। रूहानी माँ और बावा को बेफरमान होने वाला लानत के मुस्तहिक है। लानत की माअना दूर हो जाना है। दावत काइम करने में माज़ून दाई के साझेदार है।

दावत के कई किताबो में माज़ून के आला रुतबे की ज़िक्र है, जिस में से कुछ ज़िक्र सैयदना ने फरमाई - माज़ून हमेंशा सच कहते है, फिर चाहे वह बात आप के फायदे में हो या आप को नुक्सान पहुंचाने वाली हो।

सैयदना ताहेर सैफुद्दीन एक वासिले में फरमाते है कि मौत के वक्त मुमिन को कोई फ़िक्र नहीं क्यों कि पंजेतन और इमाम उज़ ज़मान के दीदार, आप के दाई और माज़ून के दीदार उसे होते है।

सतर की दावत में खासकर फितनत के ज़मान में दाई की खिदमत माज़ून करते है। कई फिरके हुए, ऐसे वक्त में माज़ूनीन ने शान से अमल फरमाया। हक के दाई के मरतबे की मारेफ़त कराई, जो एहेम ज़िम्मेदारी है, और माज़ून के कॉल को मुमिनीन ने सचाया। माज़ूनीन ने दाई की हिमायत और हिफाज़त की और कई तकलीफे सही।

माज़ून उद दावत – मौलानल खत्ताब, मौलाना अली बिन हुसैन, मौलाना मोहम्मद बिन ताहेर (आप सब ने अब्दुल मजीद के दावे के वक्त बहस की), सैयदना अली बिन मोहम्मद, सैयदना अली बिन हन्ज़ला (अहवरी की फितनत के वक्त), सैयदना इदरीस (जाफ़र की फितनत के वक्त), सैयदना शेखआदम (सुलेमान की फितनत के वक्त खिदमत बजाई और बहुत तकलीफें सही) सैयदना इस्माइल बदरुद्दीन के ज़मान में सैयेदी नजम खान माज़ून उद दावत थे (हुजूमिया की फितनत हुइ)। सैयेदी नजम खान की ज़िक्र में सैयदना बुरहानुद्दीन रि.अ. फरमाते थे कि दाई ने इम्तेहान के खातिर आप से माज़ून का रुतबा ले लिया। सैयदना अब्दुततैयेब ज़कियुद्दीन ने मज्दू की फितनत के वक्त खिदमत की, सैयेदी हेबतुल्लाह जमालुद्दीन ने सैयदना अब्दुलकादिर नजमुद्दीन के लिए अपने कागज़ में लिखा कि अल मनसूसो अलयहे मिरारन – आप पर बार बार नस्स हुइ है। सैयदना ताहेर सैफुद्दीन ने कोर्ट में इस कागज़ को सबूत के तौर पर पेश किया था।

सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन ने बयान फरमाया वही काफ़ी है कि माज़ून हक़ पर है।

सैयदना ने फरमाया कि हम हक पर है यह तो साबित ही है मगर यह भी साबित होता है कि मुखालेफीन हक पर नहीं, क्यों कि वे बातिल की बातें करते है, फोज़ोला के बारे में हल्की बातें करते है, नस्स बदली जा सकती है यह कहते है – जो दीन के उसूल के खिलाफ़ है, बयान है कि नस्स ताईद से होती है, किताबुल इल्म में दोआत के नाम लिखे है, जिस वक्त दाई काइम करते है तो सच कहते है कि नहीं दाई? बातिल की बातों से साफ़ है कि मुखालेफीन बातिल के लोग है, हक की बात से साबित है कि अपन हक पर है। सब बातें साफ़ है, वे भी बराबर समझते है कि क्या हक है और क्या बातिल।

मौलानल मिनआम ने फरमाया कि ममलूको आले मोहम्मद को किसी ने सवाल पूछा, सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन के ज़मान में, मरातिब के बारे में शर्म लिहाज़ छोड़ कर बातें करते है कई लोग, पूछा की हमे पता कैसे चले कि कौन सही है, कोई आलिम मरातिब के बारे में कुछ कलाम करे तो किस की बात माने? सैयदना ने जवाब फरमाया कि अगर कोई मिसाक की शर्तो से खिलाफ़ बात करें तो सुन ने की भी ज़रुरत नहीं। मिसाक तो दाई लेते है, दाई माज़ून का नाम मिसाक में लेते है, अब किस की बात सुननी चाहिए तुम्हें? यह समझना कुछ मुश्किल नहीं।

खुदा कुराने मजीद में फरमाते है कि मरातिब तो खुदा ने दिये है, तुम उनका हसद क्यों करते हो।

मौलाना ने हसद के बारे में एक हिकायत बयान फरमाई ।

सैयदना ने फरमाया कि बावाजी साहेब सैयदना कुत्बुद्दीन की शान अज़ीम थी। घर में कई लोग थे जो हसद करते थे। दुश्मनों ने सख्त दुश्मनी की, मगर आप शान से अमल करते, फोज़ोला का यह मकाम है।

सैयदना ने आयत पढी: ولقد آتيناك سبعا من المثاني والقرآن العظيم

खुदा तआला रसूलुल्लाह स.अ. को फरमाते है कि हमने तुम्हें सब ए मसानी (सूरतुल हम्द) और कुरआन अज़ीम अता किये।

सूरतुल हम्द को सूरतुल वलायत भी कहते है। वलायत की माअना त़ाअत है। खुदा ने इमाम की ताअत रसूल के साथ जोड़ दी है, वे मुफ्तरज़ुत ताअत है – उनकी ताअत फ़र्ज़ है। सब ए मसानी (सात का मुक़र्रर आना) यानि अइम्मत के सातरे – सात सात इमाम।

मौलाना त.उ.श. ने बरकत के लिए अइम्मत के नामो की तस्बीह की और इमामो की ज़िक्र की। इस्माइल इमाम की ज़िक्र करते फरमाया कि हम इस्माइली नाम से पहचाने जाते है क्यों कि हम मानते है की नस्स नहीं बदली जा सकती। शिया मानते है कि इस्माइल इमाम के वफात के बाद नस्स मूसा काजिम पर हुइ। कोर्ट में भी कहा कि हम इस्माइल इमाम पर नस्स में मानते है, जिसके सबब हम इस्माइली दाउदी बोहरा कहलाते है। सैयदना कुत्बुद्दीन पर नस्स हुइ, कोर्ट में कहा कि नस्स वापस नहीं ली जाती।

किताबुल इल्म में नाम लिखें हुए है, कि कौन किस आला मकाम में पहुँचने वाले है। इमाम या दाई कभी गलत कहे? गलत बात बताएं? नऊज़ोबिल्लाह।

सैयदना ने हिदायत के बयान में फरमाया कि एक जुमले में कहता हूँ कि दाई की ताअत करना। इसमें सब कुछ समा जाता है।

खुदा के हम्द और सलवात के बाद मौलाना ने इमाम हुसैन की शहादत पढ़ी और मौलातुना फातेमा की पुरदर्द शहादत पर वाअज़ तमाम की। मुमिनीन ने आहोज़ारी की और बहुत मातम किया।