सैयदना ताहेर फखरुद्दीन ने मुमिनीन को खिताब फरमाया कि ऐ इब्राहीम खालिलुलाह स.अ. की मिल्लत के लोगो! इब्राहीम के दो शेह्ज़ादे मोहम्मद और अली की दावत को जवाब देनेवाले मुमिनीन, इब्राहीम की मिल्लत, मोहम्मद के दीन और अली की वलायत सही होती है अगर यह अकीदा रखे कि इब्राहीम, मोहम्मद और अली की नस्ल में हर ज़मान में एक इमाम मौजूद है। इब्राहीम नबी की शान अज़ीम है, पर रसूलुल्लाह स.अ. का मकाम निराला है।

इब्राहीम मुस्तकर इमाम है जो नातिकियत से ज़ाहिर हुए। इब्राहीम की आल की दो नेहरें काइम हुइ। इस्माइल मुस्तकर इमाम और इसहाक को मुस्तवदा इमाम काइम फरमाया।

मुस्तकर इमाम इस्माइल मख्फ़ी में रहते है, मगर आप मालिक है, मुस्तवदा ममलुक है।

खुदा ने आले इब्राहीम को मुल्के अज़ीम अता किया। आले मोहम्मद की शान निराली है।

मुस्तवदईन अंबिया को अपने वारिस को काइम करने मुस्तकर इमाम से रज़ा की लेनी होती थी। इमाम की रज़ा आने के बाद अपने मनसूस को काइम कर सकते थे। दोआत मुतलकीन को यह शरफ है कि इमाम उन्हें ताईद, इल्हाम से, रूहानियत से अपने मनसूस के बारे में फरमाते है, और इमाम की गादी पर बैठने का दोआत को शरफ अता फरमाते है। दोआत को यह भी शरफ है कि दोआत आले मोहम्मद में शामिल है।

सैयदना कुत्बुद्दीन, सैयदना ताहेर सैफुद्दीन से सुनी ज़िक्र फरमाते है कि क्या दुनिया का कोई बादशाह अपनी प्रजा से यह कहता है कि तुम हमारे थकी (साथ) हो। इमाम, आप का मकाम कितना बलंद, मुमिनीन को फरमाते है कि तुम हमारे थकी हो।

मौलानल मन्नान ने जुमोआ के दिन के फ़ज़ाइल बयान फरमाये और जुमोआ के दिन में क्या अमल करन चाहिए यह हिदायत फरमाई। जुमोआ के दिन सलवात कम से कम १००० बार पढ़े। रसूलुल्लाह स.अ. ने बताया है वैसे सलवात पढनी चाहिए, मोहम्मद और आले मोहम्मद पर सलवात पढ़े। अक्सर लोग नबी मोहम्मद पर सलवात पढने के बाद रुक जाते है। रसूलुल्लाह स.अ. ने बताया कि मगरिब की नमाज़ तीन रकअत पढ़े। तीन रकअत के बदल एक रकअत पढ़े तो नमाज़ कबूल नहीं है। रसूलुल्लाह स.अ. पर कोई सलवात पढ़े तो रसूलुल्लाह स.अ. उनके हक़ में दोआ फरमाते है, जिस तरह खुदा फरमाते है कि तुम मुझे याद करो, तो मैं तुम्हें याद करूँगा।

सैयदना ने फरमाया के सलवात की माअना समझ कर पढ़ना चाहिए। माअना यह है के नस्स ब नस्स, मोहम्मद, अली और फातेमा की नस्ल में इमाम बाद इमाम, हुसैन की नस्ल में क़यामत के दिन लग इमामत का सिलसिला जारी रहेगा। इसी तरह दोआत का सिलसिला जारी रहेगा, इमाम के ज़ूहूर तक या फिर क़यामत तक।

मौलानल मिनआम ने इब्राहीम नबी स.अ. की मजलीस में कुरआन मजीद की यह आयत पढ़ कर माअना बयान फरमाई

وَإِذٰ قَالَ إِبٰرَاهِيمُ رَبِّ أَرِنِي كَيٰفَ تُحٰيِي الٰمَوٰتَىٰ"

इब्राहीम ने खुदा से अर्ज़ की के ऐ रब तू मौता (मृत) को जिंदा कैसे करता है यह मुझे बता।

सैयदना त.उ.श. ने फरमाया कि इब्राहीम ने बुत परस्त लोगो से शान से हुज्जत फरमाई, और हर नबी हुज्जत काइम फरमाते है ।

रसूलुल्लाह स.अ. ने मुखालेफीन से हुज्जत (बहस) की। रसूलुल्लाह स.अ. के दाई सैयदना कुत्बुद्दीन रि.अ. ने अजब शान से बुरहानुद्दीन आका के वफात के बाद मुखालेफीन को बहस करने को फरमाया। फरमाया कि आप मस्जिद में सब के सामने बहस करने तैयार है, मगर किसी ने जवाब नहीं दिया। मुखालेफीन जानते है कि हुज्जत करेंगे तो सच ज़ाहिर होगा, जूठी खोराफात सब के सामने आ जाएगी।

सैयदना ने फरमाया कि दावत की गादी पर आने के बाद, हमने उन्हें दोबारा बहस के लिए बुलाया, मस्जिद में बहस करने बुलाया, मगर कोई जवाब नहीं, हुज्जत करने तैयार नहीं है और कहते है कोर्ट में क्यों गए। कोर्ट में हज़ार के करीब सवाल पूछे गए, जवाब जो भी कहा हक की बात कही। बुजुर्गो ने कहा है कि खुदा के हाथ लम्बे है, कोई छूट नहीं सकता। 

मौलानल मिनआम ने “وَإِذٰ قَالَ إِبٰرَاهِيمُ رَبِّ أَرِنِي كَيٰفَ تُحٰيِي الٰمَوٰتَىٰ” आयत की ४ फसल बयान फरमाई और इसकी हकीकी माअना बताई।

मौलाना ने सैयदना हातिम रि.अ. और सैयदना अली बिन मोहम्मद बिन अल-वलीद की ज़िक्र करते हुए फ़रमाया कि सैयदना अली बिन मोहम्मद मलाएकत से बढ़कर है। सैयदना ताहेर सैफुद्दीन और सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन ने यह ज़िक्र करते हुए ताकीदन और बार बार  फरमाया है कि सैयदना हातिम का इरादा था कि सैयदना अली बिन मोहम्मद बिन अल-वलीद को अपना जाँनशीन बनाए, अभी नस नहीं फरमाई थी, इरादा था। सैयदना हातिम ने नस्स अपने शेह्ज़ादे सैयदना अली बिन हातिम पर फरमाई।

इमाम की ताईद और इल्हाम से नस्स की जाती है। नस्स करने के बाद फिर बदली नहीं जाती। नास (नस्स करने वाले मौला) उस साहिब पर नस्स फरमाते है जो आप के मिसल बन चुके हो। दोआत के नाम मौलाना अली ने किताबुल इल्म में लिख दिये है। दोआत का सिलसिला मुद्दखर है (तय है)। कोर्ट में भी यह कहा कि इमाम से इल्हाम सच ही होता है। उसमें रद्दोबदल का सवाल ही नहीं। सच्चाई कैसे बदल सकती है? सच्चाई अगर बदल जाए तो फिर वह सच्चाई नहीं। हक की बात तो एक ही होती है। आज मुखालेफीन इस तरह की बातें करते है। हक का तसव्वुर बदल रहे है, कहते है नस्स बदली जा सकती है।

दोआत मुमिनीन की हिदायत के लिए अमल करते है। हंमेशा की ज़िन्दगी हांसिल हो इसके खातिर और मौता (मुरदे) को भी जिंदा करते है। सैयदना कुत्बुद्दीन ने मौजिज़ा दिखाया, उज्जैन में एक फरजंद तीसरी मंजिल से गिर कर गुज़र गया। उसे आप के मौजिज़े से दोबारा हयात मिली। एक डॉक्टर जो उस वक्त वहाँ हाज़िर थे, कहा कि मैं शहादत देता हूँ, यह बच्चा गुज़र गया था।

हक़ के दाई मौलाना फखरुद्दीन ने जलाल से फ़रमाया कि मुखालेफीन लोगो को डराते है। अगर वे हक पर है तो उन्हें क्या फिकर? लोग किस बात से घबरा रहे है, सोसायटी के लोग उन्हें छोड़ देंगे? यह तो दुनियादारी की बात है। दीन की बात नहीं। ला इकराहा फिद दीन, दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं है।

मौलाना त.उ.श. ने गए साल में हुइ आप की सफ़र की ज़िक्र फरमाई। आप ने इंदौर, दुबई की सफ़र की। दिल्ही में आप की कियादत में हुइ तकरीब कोंफरंस की ज़िक्र फरमाई, जिस में दलाई लामा और सभी धर्मो के पेशवाओ ने शिरकत की थी। दलाई लामा ने सैयदना त.उ.श. की इस पहल को बहुत ही सराहा और कहा कि आप जो अमल कर रहे हो वह इस्लाम के लिए भी बेहतर है, और हर साल इस तरह की कोंफरंस अक्द करने की सैयदना से गुज़ारिश की।

दावत में कई संस्थाएं तरह तरह की खिदमत अंजाम दे रही है इसकी ज़िक्र मौलाना त.उ.श. ने  फरमाई, और सभी खिदमत गुज़ारों के हक में लाकीमत दोआए फरमाई।

मौलानल मिनआम ने खुदा का हम्द और सलवात पढ़ कर अब्बास अलमदार अ.स. की शहादत की पुर दर्द ज़िक्र फरमाई और इमाम हुसैन स.अ. की शहादत की ज़िक्र पर वाअज़ तमाम की।