अल दाई अल फातेमी सैयदना ताहेर फखरुद्दीन  त.उ.श. ने इमाम हुसैन अ.स. की अज़ा की दूसरी मजलीस में मुमिनीन को ख़िताब करते हुए फरमाया कि ए एहले बैतुन नुबुव्वत के सफीने में सवार होने वाले मुमिनीन! मोहम्मद, अली, फातेमा, हसन और हुसैन, खम्सत अतहार, सफिनतुन नजात, जो सब हक़ की दावत को काइम करने वाले है। जो उन्हें ताबे हो कर, सफिने में सवार हो, वे नजात हांसिल करते है, जो सवार न हो वे दीन और दुनिया दोनों में खोटीये है। अपन सफिने में सवार होंने वाले है, किस राह पर कि यह अकीदा रख कर कि हर ज़मान में पंजेतन के वारिस इमाम उज़ ज़मान अ.स. मौजूद है।

सफिने मे सवार होने की माअना यह है कि उनकी मोहब्बत, उनकी मोहब्बत करे तो नजात हांसिल है।

अपन सफिनतुन नजात में सवार क्यों है, हुसैन कि दोआ के सबब। अव्वलीन आखेरीन का दैन अदा करनेवाले हुसैन है। रसूलुल्लाह स.अ. को इमाम हुसैन ने दैन अदा करने का जो वादा किया वह ज़िक्र सैयदना त.उ.श. ने फरमाई।

मौलाना ने ज़िक्र फरमाई कि हुसैन की ज़ात मुबारक सफीनतुन नजात है, करबला में खुश्की में आप ने सफीना चलाया, हुसैन के दाई सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन फरमाते है “फुल्कुल हुसैने बे करबला...”। इमाम हुसैन दूसरी तारीख मोहर्रमुल हराम को करबला पहुंचे, मौलाना ने फरमाया आज हम हर रोज़ हुसैन की मजलीस में जमा होते है, हुसैन को याद करने। दिल से सोचो कि हम हुसैन के साथ करबला में है, फ़िदा होने आये है, ज़िक्र करने, आँखों से आँसू रवां करने आये है।

आगे मौलानल मन्नान ने फरमाया कुरआन मजीद में अमसाल बयान किए गए है, कुरआन में सफीना का मसल (माअना) क्या है के दावत। जो साहेब दावत करते है उनकी ज़ात ही दावत है। वे सफीनतुन नजात है।

पैदाइश का सबब क्या है अपन जानते है, अफज़ल हाल में हम लौटे इस लिए यह पैदाइश हुइ है, इसी के लिए दुनिया में हक की दावत काइम है। जो इस दावत को जवाब दे, सफिने में सवार हो, वह कुदुस के किनारे पहुंचे।

इख्वान उस सफा में से एक जज़ीरे की नादिर हिकायत सैयदना ने बयान फरमाई।

आज दूसरी मजलीस है, नूह नबी की ज़िक्र की मजलीस है। मौलाना ने नूह नबी स.अ. की ज़िक्र फरमाई।

सफिने को फुल्क भी कहा गया है – फुल्कून नजात – कुरआन मजीद में फुल्क २१ जगह है, सफीना ४ जगह है।

फुल्क के तीन हुरूफ़ है, तीन फसल मौलाना त.उ.श. ने बयान फरमाई।

फसल: नूह के दौर की ज़िक्र फरमाई

कुरआन में नूह नबी को खुदा फरमाते है, "واصنع الفلك باعيننا ووحينا"

सफिने को हमारी आँखों के सामने हमारे वहये से बनाओ।

कौम में से जिन लोगो ने नूह को जवाब नहीं दिया, जब तूफ़ान आया, वे सब गरक हुए। मगर नूह और सफीना में सवार बच गए।

एक माअना यह है कि नूह ने अपने वसी को काइम फरमाया, वसी सफिने की शान में है।

दूसरी फसल: रसूलुल्लाह स.अ. फरमाते है : مثل اهل بيتي فيكم كسفينة نوح من ركبها نجا ومن تخلف عنها غرق

मेरे एहले बैत तुम्हारे दरमियाँ नूह के सफिने के मिसल है, जो उनके साथ होगा वह नजात हांसिल करेगा, और जो उनसे तखल्लुफ़ करेगा, पीछे रहेगा, गरक हो जाएगा। दोनों हालत की  बातें फरमाई दी साथ में, सवार नहीं होगे तो गरक हो जाओगे।

रसूलुल्लाह स.अ. के मेहराब और मिम्बर के वारिस अली का हक छीना गया, तूफ़ान के बाद तूफ़ान, इमाम हसन, हुसैन और ज़ैनुल आबेदीन के ज़मान में भी तूफ़ान आये, मगर दावत काइम है।

तीसरी फसल: आले मोहम्मद के दोआत नजात का सफीना है

दोआत इमाम की दावत काइम करते है। इमाम उज़ ज़मान से दोआत को कितनी नज़दीकी है कि, “बे आअयोनेना”, और इमाम की ताईद की सवारी उनके तरफ जारी है “व वहयेना”।

सैयदना ताहेर सैफुद्दीन रि.अ. फरमाते थे कि मैं सैंकड़ो मुमिनीन को कुदुस के किनारे पहुंचा कर आया हूँ, और तुम्हे अपने साथ ले कर चलता हूँ। सैयदना फखरुद्दीन ने फरमाया कि  आज ममलूके आले मोहम्मद उनका वारिस हूँ, तुम्हेँ यह कहता हूँ, यह हक की दावत है, सफीनतुन नजात है, तुमने दावत को जवाब दिया है, वल्लाहे इलल जन्नते इन्शाअल्लाह, कुदुस के किनारे पहुँचने वाले है।

मौलाना ने फ़रमाया कि मुमिन मिसाक दे तो यह समझ कर कि अपने जान की नजात के लिए दावत में शामिल हो रहा हूँ। कोई क्लब या सोसायटी समझ कर नहीं, बलके अपने जान की नजात के लिए।

कितने मुश्किल वक्त में हक की दावत को दोआत ने संभाला है।

सैयदना बुरहानुद्दीन आका, आप के ज़मान में बिदअत की फितनत होना शुरू हुआ। ओलमा-उस-सू  गलत तसव्वुर देने लगे। कहने लगे ज़ाहिर-बातिन अलग। मिसाक में ही कसम है कि ज़ाहिर-बातिन अलग तो नहीं करोगे। ओलमा-उस-सू (इल्म का गलत इस्तेमाल करने वाले) काला पानी पिलाते है। कहते थे ज़ाहिर में है, बातिन में कोई और है, यह सब बाते हमने उनसे सुनी है। कहते थे ज़ाहिर में है माज़ून, बातिन में दरअसल कोई और माज़ून है।

बुरहानुद्दीन आका के वफ़ात के बाद के हालात की ज़िक्र फरमाई। बावाजी साहेब ने अजब शान से, दावत के सफिने के कप्तान बन कर सफिने को चलाया, चाहे कितने ही मौज आए। सैयदना अब्दुल कादिर नजमुद्दीन के वारिस, मौलाना कुत्बुद्दीन दारुस सकीना तशरीफ़ लाए। जो मुमिनीन ने आप को जवाब दिया, बुरहानुद्दीन आका के मनसूस को मौला माना, वे सफीनतुन नजात में सवार हुए, कुदुस के किनारे पहुंचे और पहुँचने वाले है। ऐसे मुश्किल और नाज़ुक वक्त  में मौलाना कुत्बुद्दीन ने सफिने को चलाया। हक के दाई आप है। दुश्मन की गालीयों से कोई फर्क नहीं पड़ता है। जो लानत बुलवाते है उन पर खुदा का सख्त अज़ाब हो, उन पर उसका वबाल उतरे।

मौलाना कुत्बुद्दीन की सबर और हिम्मत की अजब शान, हिम्मत काअसा, कैसी हिम्मत, चारो ऑर से घिरे हुए है, हुसैन के दाई की शान देखो, किसी की परवाह नहीं, परवाह अगर है तो सिर्फ हक की, अजब आप का इखलास और सफा था।

बावन व़े दाई ने सैयदना फखरुद्दीन का मिसाक लिया उस के शुकुर में ५३ व़े दाई ने बावन व़े दाई की शुकुर की जियाफत की। जियाफत में सैयदना बुरहानुद्दीन की गादी के पीछे एक सफीना रखा गया, सैयदना कुत्बुद्दीन ने तक़रीर में पुरखुलूस अर्ज़ की के मैं, आप का गुलाम,

मैं फ़िदा हूँ, मेरे फरजंद, मेरे फ़रज़न्द के फरजंद आप पर फ़िदा है।

मौलानल मन्नान ने मुमिनीन को मौएज़त के नादिर जुमले फरमाए।

मुमिन अपनी जिन्दगी दीन के उसूल के मुताबिक़ गुज़ारे यह समझाया। दीन ज़िन्दगी का सिर्फ एक हिस्सा या कम्पार्टमेंट नहीं, सिर्क लैलतुल कदर या आशूरा मैं सोसायटी के खातिर शामिल हो गए ऐसे नहीं, बलके दीन ज़िन्दगी गुज़ारने की राह है, जीने का तरीका है।

हम्द, सलवात और दोआइ कलेमात के बाद, नौहा के बयान में इमाम हुसैन ने करबला में खुश्की में सफीना चलाया इसकी ज़िक्र फरमाई। मौलाना अली असगर की शहादत पढ़ी और इमाम हुसैन की शहादत के बयान पर वाअज़ तमाम हुइ।