आज इमामुज़ ज़मान के दाई ने कुरआने मजीद की आयत शरीफा “लहू दावतुल हक” अर्थात हक की दावत खुदा के लिए है, यह आयत पढ़ कर वाअज़ शुरू फरमाई.

वाअज़ में इमामुज़ ज़मान (स.अ.) के दाई ने अजब शान से आले मोहम्मद के उलूम की नहर जारी की. आप मौला ने सफीनतुन नजात की ज़िकर फरमाई कि सफीनतुन नजात हक की दावत का प्रतीक है. जो शख्स  खुदा के अवलिया की वलायत करता है वह इस सफीने में सवार है.

जो सफीने में सवार होता है वह समुद्र में डूबने से बच जाता है. उसी तरह खुदा के अवलिया की वलायत रखने वाला दुनिया रुपी समुद्र में डूबता नहीं और नजात हासिल करता है. सफीने के कप्तान मुमेनीन को कुदुस (जन्नत) के किनारे पोह्न्चा देने की ज़मानत/ज़िम्मेदारी लेते है.

सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) ने अपने एक कसीदे में फरमाया है कि

दावतोकुम हाज़ेही फुल्कुन नजाते लना :: तजरी लेमौजिल इदाखारेकतन माखेरा

माना: आप की दावत हमारे लिए नजात का सफीना है जो दुश्मनों के मौज को चीरते हुए चलता है.

सैयदना फखरुद्दीन (त.उ.श.) ने सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन (री.अ.) को याद करते हुए फरमाया कि आप मौला जज्बे के साथ यह फरमाते कि, “मैंने सैकड़ों को कुदुस (जन्नत) के कनारे पोह्न्चाया है और वहाँ से खबर भी आ गई.” आज, उनके वारिस ने उसी शान से यह फरमाया कि, “ आज मैं मोहम्मद और आले मोहम्मद के सफीने का कप्तान हूँ और मैं, ए मुमेनीन, सभी को कुदुस (जन्नत) के कनारे पोहंचा दूंगा.” खुदा की कसम खाकर आपने फरमाया कि, “वल्लाहे इलल जन्नते इंशाअल्लाह” (खुदा की कसम जन्नत में पोहंच जाओगे)

हर अमल में खुदा और खुदा के वली इमाम उज़ ज़मान से यारी और मदद तलब करते है. सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) ने सैयदना ताहेर सैफुद्दीन के ज़मान में वाअज़ के और बयान के शुरू में यह पढना शुरू फरमाया कि “व बेही, व बे वालिय्येही, “व बे दाई हे”, नस्तईनो फी जमी इल उमूर. पहले यह वाक्य अदा करने की आदत नहीं थी. सैयदना ताहेर सैफुद्दीन ये अमल से बहुत खुश हुए. सैयदना फखरूदीन (त.उ.श.) ने फरमाया कि यह सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) की हसनत है. सैयदना (त.उ.श.) ने मुमेनीन को हर रोज़ कम से कम ११० दफ़ा इय्याक नाअबोदो व इय्याक नस्तईन कि तस्बीह करने की व अल्लाह से यारी तलब करने की हिदायत दी.  

सैयदना फखरुद्दीन (त.उ.श.) ने छटवे दाई सैयदना अली बिन हंज़ला (री.अ.) द्वारा लिखित किताब “सिम्तुल हकाइक” में से जिन अबियात में अवलिया की ज़िकर है और दोआत को शुकुर अर्ज़ किया है उन अबियात की पुर-असर अंदाज़ से तिलावत की. आप मौला ने इस किताब में से अजब शान से असरार बयान फरमाए. यह किताब एक कसीदे के रूप में है जिसमें ५०० से ज़्यादा अबियात है और सैयदना फखरुद्दीन को यह पूरी किताब याद है. इस किताब में मब्दा अर्थात पैदाइश के बारे में और मआद अर्थात आखेरत के बारे में बयान है.

इन दोआत किराम के कारण आज हम हक पर है और हकीकत का इल्म हासिल कर सकते है. इमाम (अ.स.) के सतर के बाद दोआत ने हकीकत के असरार को किताबों में लिख दिया. आप मौला ने फरिश्तों के आलम की व वहाँ जो दावत काइम की गई है उसकी ज़िकर फरमाई और यह फरमाया कि इस आलम में भी वही दावत काइमा है और कयामत के तक काइमा रहेगी.

वैज्ञानिक दुनिया के बारे में खोज करते है और बेहेस करते है, थ्यरी बनाते है जैसे बिग बेंग थ्यरी लेकिन उन्हें इस दुनिया को बनाने की वजह का इल्म नहीं जो सबसे अहम सवाल है. यह इल्म मवाली ताहेरीन के पास है. हर ज़मान में एक साहेब है जिन्हें फरिश्तो के आलम से फैज़ आता है. इसलिए उन्हें पैदाइश का इल्म है.

सैयदना फखरुद्दीन (त.उ.श.) ने फरमाया कि दौरुल कश्फ के बाद दौरुस सतर आता है और इसके मुतअल्लिक कई ज़िक्रे फरमाई.

आदम नबी (अ.स.) की ज़िकर में आपने फरमाया कि इब्लीस की फित्नत के कारण आप के बड़े बेटे काबील ने अपने भाई हाबील का कतल कर दिया. हबील आदम के वसी है. इस दौर कि शुरुआत ही इस तरह हुई. इस दौर में खैर लोगो के ऊपर शर के लोग (बुराई करने वाले लोग) ग़ालिब हो जाते है.

नूह (अ.स.) का बेटा आपके सफीने में सवार न हुआ. नूह (अ.स.) ने खुदा को अर्ज़ की, कि “खुदा मेरे बेटे को बचा ले.” खुदा ने फरमाया कि, “वह तुम्हारे एहल में शामिल नहीं और वह अमल सालेह नहीं है.”

 अंबिया के ज़माने में फित्नते हुई.

युसुफ नबी (स.अ.) के भाईं, जो हुज्जत थे, वे हसद के कारण आपकी दुश्मनी पर आमादा हो गए. अय्यूब मुब्तला हो गए.

 

दुरुस सतर में अंबिया अइम्मत और दोआत के ज़मान में दुश्मनों का गलबा रह्य है. बहुत ही कम ज़माने ऐसे थे जिसमें फित्नतों से अमान था.

जुहूर के ज़माने में भी फित्नतें हुई. इमाम हाकिम (स.अ.) के ज़माने में ददरूज़ जो करने वाले लोग थे वह निकले,  और इमाम मुस्तन्सिर (स.अ.) के ज़माने में बड़ी मेह्नतें आई. इमाम के महल से कई चीज़े लुट गई. मुस्ताली इमाम के ज़मान में निज़ार ने फित्नत की.

दोआत के ज़माने में भी फित्नतें हुई. सैयदना हातिम (री.अ.), सैयदना दावूद बिन कुतुबशाह (री.अ.) और सैयदना शेखआदम सफीउद्दीन (री.अ.) के ज़माने में आपके घर और कराबत के लोगों ने फित्नत की. फित्नत इतनी जियादा हुई कि सैयदना कुत्बुद्दीन शहीद (री.अ.) को शहीद कर दिया और सैयदना फीरखान शुजाउद्दीन को डेढ़ साल तक कैद में रखा और कैदी कि तरह एक जगह से दूसरी जगह ले गए. सैयदना अब्दुलकादिर नजमुद्दीन (री.अ.) के ज़माने में इस मान्यता के लोगों ने फित्नत की कि सैयदना अब्दुलकादिर नजमुद्दीन (री.अ.) पर नस्स नहीं हुई है. इन लोगों ने दावत के अन्दर रहकर मुमेनीन के एतेकाद को नुकसान पोह्न्चाया.

सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) के ज़माने में दुश्मनों ने फित्नत की और आपकी अदालत में ज़बानी हुई और खुदा तआला ने आपको फतेह मुबीन अता की. आपने सफीने को संभाला और उसी तरह आपके वारिस सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन ने सफीना चलाया.

सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) के ज़माने में दावत के सफीने पर एक बहुत बड़ा मौज आया. दावत पर बहुत बड़ी मुसीबत आई. सैयदना फखरुद्दीन (त.उ.श.) ने सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन (री.अ.) के वफात के वक्त जो फित्नत हुई उसकी ज़िकर फरमाई और सैयदना कुत्बुद्दीन के जलाल और इत्मीनान की ज़िकर फरमाई. चारों तरफ से तूफ़ान था लेकिन आपको केवल मुमेनीन कि फिकर थी. जिस तरह साबिक दोआतों ने मेहनतें सहकर मुमेनीन को हिदायत दी और दावत को संभाला बिलकुल वैसे ही सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) का अमल था.

सैयदना फखरुद्दीन (त.उ.श.) ने मौएज़त फरमाई कि अक़लमंद कौन है कि जो मौत की ज़िकर करता है और आखेरत के लिए तैयारी करता है.

मौलाना अली स.अ. ने फरमाया है कि दुनिया गुज़रगाह है, मौत खुदा की मिन्नत और एहसान है क्योंकि मौत हमेशा कि ज़िन्दगी का सबब बनती है. सैयदना फखरुद्दीन ने मिसाल दी कि अगर कोई व्यापार के मकसद से परदेस में किसी होटल में रुकता है, तो क्या वह अपना समय अपने काम में बिताएगा या होटल के कमरे को सजाने में, जहाँ उसे सिर्फ चंद दिन बिताने है. खुदा ने जो हमें मोहलत दी है, उसे आखेरत कमाने के लिए बितानी चाहिए, सिर्फ दुनियादारी के लिए नहीं.

सैयदना फखरुद्दीन ने दोआ के लाकीमत जवाहिर बख्शे. खुदा का हम्द और सलवात पढ़कर, मौलाना अली असगर और इमाम हुसैन कि शहादत पढ़कर वाअज़ तमाम की.