मोहर्रमुल हराम की छठवी तारीख की वाअज़ में सैयदना ताहेर फखरुद्दीन (त.उ.श) ने मुमेनीन को खिताब करते हुए फरमाया कि मुमेनीन मोहम्मदुल मुस्तफा सरवरे काएनात, सैयदुल अंबिया वल मुरसलीन की उम्मत खास्सा है. सैयदना (त.उ.श.) ने रसुलुल्लाह (स.अ.व.) और अमीरुल मुमेनीन (स.अ.) के मकाम की मारेफत करते हुए फरमाया कि दोनों को हमशान मानना चाहिए. मारेफत में कम ज़ियादा न करे.

रसुलुल्लाह का बड़ा मोजिज़ा यह है कि चाँद के दो हिस्से हुए और अमीरुल मुमेनीन के लिए सूरज गुरूब होने के बाद फिर से उसी दिन वही स्थान पर आ गए. यह सब मआजिज़ हकीकत है.

रसुलुल्लाह (स.अ.व.) ने जो हिदायत दी उसके बदले में आपने कुछ नहीं मांगा मगर आपके एहले बैत की मोहब्बत. उसके लिए कुरान की यह आयत नाज़िल हुई है कि, “ कुल ला असअलोकुम अलैहे अजरन इल्लल मवाद्दत फिल कुरबा.” में तुम्हारे पास से कुछ अजर नहीं मांगता लेकिन यह कि मेरे कराबत (रिश्तेदारों) की मोहब्बत करना. कराबत के लोग यानी अली, फातेमा और फातेमा के फरज़न्द, अइम्मत ताहेरीन.

अमीरुल मुमेनीन (स.अ.) ने वसीयत फरमाई है कि रसुलुल्लाह (स.व.अ.) ने जो अजर मांगा है ,उसे बराबर वफा करो (अदा करो). मोहब्बत फर्ज़ की है.  यदि न किया तो यह माना जाएगा कि मोहम्मद के साथ झगडा किया.

रसुलुल्लाह (स.व.अ.) रेहमत मुशख्खसा के साहेब है और आपके बाद अली (स.अ.) रेहमत के वारिस है. खुदा के अदल में यह है कि हर ज़मान के लोगों को रेहमत मिलती रहे. अदल में यह है कि हर ज़मान में इस रेहमत के खमीरे के वारिस होने चाहिए वह कौन है कि इमामुज़ ज़मान. इमाम की मोहब्बत है तो यकीन रखना कि रसुलुल्लाह की मोहब्बत की. दोआत की मोहब्बत की तो इमाम की मोहब्बत की क्योंकि दोआत के हाथ पर हिदायत मिलती है. इमाम की मारेफत दोआत के सबब होती है. सैयदना अली बिन मोहम्मद बिन वलीद सैयदना हातिम की शान में फरमाते है कि “वला नकूलो इमामुल असरे मुस्ततेरून व अंत या रह्मतर रहमाने दाईना”. हम कहते ही नहीं कि इमाम परदे में है जब आप ए रहमान के दाई हमारे दरमियान मौजूद है.

सैयदना ने यह आयत पढ़ी कि “या अय्योहन नबीयो इन्ना अर्सलनाक शाहिदन व मुबश्शिरन व नज़ीरा व दाईयन इलल्लाहे बेईज़नेही व सिराजन मुनीरा” पढ़ी और उसके ३ वुजूह बयान फरमाएँ.

पहला वुजूह आप मौला ने सैयदनल काज़िन नोमान (री.अ.) के बयान में से सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) ने जो बयान फरमाया है वह बयान किया.

इस आयत में ५ सिफ़तें है. शाहिद, मुबश्शिर, नज़ीर, दाईयन इलल्लाहे बेईज़नेही व सिराजन मुनीरा. यह ५ सिफतें अंबिया पर वसल फरमाई (जोड़ ज़िकर फरमाई) और रसुलुल्लाह (स.अ.व.) के साथ तफसीर से मुकाबला (जोड़) ज़िकर फरमाया. 

दूसरें वजह में सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) की तौजीह से बरकत लेकर बयान फरमाया. उसमें इन पाँच सिफातों को पंजतन के ओर मुतवज्जेह तफसीर से बयान फरमाया.

शाहिद कौन है कि रसुलुल्लाह (स.अ.व.). सैयदना (त.उ.श.) ने रसुलुल्लाह (स.अ.व.) की मुख्तसर (संक्षेप में) अखबार ज़िकर फरमाई. मेअराज में चौथे आसमान पर मूसा नबी (अ.स.) से मुलाकात हुई और मूसा नबी ने नमाज़ के ५० फर्ज़ की तख्फीफ करके ५ फ़र्ज़ करवाएँ. उसमें एक आला सुआल कि नमाज़ की फरीज़त पहले नाज़िल हो चुकी थी और मेअराज बाद में हुआ तो मेअराज में ५० फ़र्ज़ किस तरह हुए? दाई को इस्तिम्बात का हक है और आप मौला ने इसका जवाब इमामुज़ ज़मान की ताईद की बरकत से फरमाया.

मुबश्शिर कौन कि मौलाना अली (स.अ.). आप मौला ने हारिसे हमदान की ज़िकर में जो बिशारत है कि अली (स.अ.) के शीआ नजात पाएँगे उसकी ज़िकर फरमाई.

नज़ीर कौन कि मौलातोना फातेमा. मौलातोना फातेमा मौलाना अली के हुज्जत है. मौलाना अली (स.अ.) का हक साबित करने के लिए आप मजलिस में तशरीफ ले गई और इन्ज़ार किया कि यदि तुम अली का हक गस्ब करोगे तो तुम्हे सख्त अज़ाब होगा.

दाईयन इलल्लाहे बेईज़नेही कौन कि हसन इमाम. आपने मुआविया के साथ सुलह की और उसे ज़ाहिरी खिलाफत सोंप दी और मदीना तशरीफ ले गए और वहा दावत काइम करते रहे.

सिराजे मुनीर कौन है कि इमाम हुसैन. आप इस्लाम और ईमान के चिराग है. आपने दुश्मन के साथ जिहाद की. आज तक इमाम हुसैन की रोशनी आलम में फैली हुई है.

सैयदना (त.उ.श.) ने पाँच नमाज़ों की ज़िकर फरमाई और फरमाया कि वह पाँच उलुल अज़म पर मसल है और उनके वक्त ५ पंजतन पर मसल है.

आप मौला ने नमाज़ के लिए ताकीद फरमाई और सुन्नत व नवाफिल पढने की ओर रगबत दिलाई. यदि फ़र्ज़ पढने में कुसूर रह जाता है तो सुन्नत और नाफेलत पढने से वह दुरुस्त हो जाता है. नमाज़ की अहम्मियत की ज़िकर में आप मौला ने फरमाया कि नमाज़ को हमेशा दूसरें आमाल पर मुकद्दम करना चाहिए. नमाज़ ध्यान से और खुदा की खशियत का एहसास रखकर पढ़नी चाहिए और तहारत का खयाल रखना चाहिए.

तीसरा वुजूह सैयदना (त.उ.श.) ने सैयदनल काज़ीन नोमान (री.अ.) के बयान में से बयान फरमाया.

शाहिद कौन कि दौर के नातिक या हर ज़मान के इमाम.

मुबश्शिर कौन है कि नबी के असास या इमामुज़ ज़मान के हुज्जत उज़मा (होनेवाले इमाम).

नज़ीर कौन है कि हुज्जतुन नहार.

दाईयन इलल्लाहे बेईज़नेही कौन है के दाईल मुतलक और सिराजे मुनीर माज़ून के मर्तबे पर दलालत करता है.

सैयदना (त.उ.श.) नेसिराजे मुनीर के बयान में मवाज़ीन में से कुछ माज़ून की शानात की ज़िकर फरमाई.

मौलानल खत्ताब, मौलाना मोहम्मद बिन ताहेर ने सतर के शुरू में लोगों के एतेकाद मज़बूत करने में बहुत मेहनत की. सैयदना अली बिन मौला मोहम्मद बिन अल वलीद की शान में यह ज़िकर है कि मलाइकत से आपका दरजा जियादा है. ताजुल अकाइद में बयान है कि माज़ून हमेशा हक की (सहीह) बात करते है चाहे उनके हक में हो या उनके खिलाफ हो.

सैयदना (त.उ.श.) ने सैयदी हकीमुद्दीन (अ.क.) के इखलास और आपकी सीरत की (आपके जीवन की) ज़िकर में फरमाया कि आप जुमोआ की रात में आप मुमेनीन के मोहल्ले में तशरीफ ले जाते और वहाँ के अहवाल (हालात) में नज़र फरमाते और वहाँ मुमेनीन के बीच के मामलों में फैसला करते. आपका इखलास में दर्जा इतना बलंद था कि जब दाई के मिसाल (कागज़) आते तो उस मिसाल को अज़मत के खातिर खड़े हो कर अपने मस्तिष्क पर रखते और उसे चूमते. आप नमाज़ की बड़ी ताकीद फरमाते. सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन (री.अ.) के माज़ून सैयदना कुतबुद्दीन (री.अ.) का भी इखलास में यह दर्जा था. जब बुरहानुद्दीन मौला का पैगाम आता तो शुकुर का सजदा करते. दाई के मिसाल को अपने मस्तिष्क पर रखते, चूमते और अपने फर्ज़न्दों को भी सजदा करने का फरमान करते और मिसाल चुमाते थे. हमेशा आप मौला दोआ में लम्बा सजदा करते.

सैयदना (त.उ.श.) ने मुमेनीन को बेहतर अख्लाक कि मौएज़त फरमाई कि हमेशा सच बोले, किसी का बुरा न करे और बुजुर्गो की नेक सीरत पर चले.

आप मौला ने हम्द सलवात की तिलावत की और इमाम हुसैन की शहादत और रसुलुल्लाह (स.अ.व.) की शहादत पर वाअज़ को तमाम की.