मोहर्रमुल हराम की चौथी तारीख इब्राहीम नबी की मजलिस में सैयदना ताहेर फखरूदीन (त.उ.श.) ने रसुलुल्लाह (स.अ.व.) की हदीस पढ़ कर वाअज़ शुरू फरमाई. रसुलुल्लाह ने फरमाया कि, “आप और मैं ए भाई अली अपने वालिद इब्राहीम की दावत है.” इस कौल में बहुत असरार समाए हुए है.

मुस्तकर्रीन अइम्मत का सिलसिला इब्राहीम नबी (अ.स.), रसुलुल्लाह और इमाम हुसैन की नसल में  वालिद के बाद वलद (फर्ज़न्द), इस तरह जारी रहेगा. इमामे हक की दलील क्या है कि उनके वालिद भी इमाम हो और उनके बेटे भी इमाम हो. आज इमामुज़ ज़मान ज़मीन की पीठ पर हाज़िर है मौजूद है. मौज़ेउस सुजूद (सजदा देने की जगह) है. उस पर दलील क्या है कि कल दिन था, आज दिन है और अकलमंद जानता है कि कल भी दिन आएगा.  इसी तरह इमाम थे, आज है और इमाम कल भी होंगे.

इमाम पर्दा इख़्तियार करते है तो परदे में इमामत का सिलसिला जारी रहता है और इमाम की रज़ा (इजाज़त) से दोआतों का सिलसिला काइम हुआ है. दाई की निशानी क्या है कि उनपर नस्स की गई हो. इमाम के इलहाम से एक दाई दूसरें दाई पर नस्स करके ही वफात पाते है. यही दाइल हक की निशानी है. इसलिए दाई को दाइल्लाहिल अमीन कहते है क्योंकि वे खुदा की अमानत अदा करते है.

सैयदना (त.उ.श.) ने इमाम के नज़दीक आपके शीआ की क्या करामत है उसकी ज़िकर फरमाई.

दावत की मजलिस में आने का शौक फरिश्तों को भी है क्योंकि उन मजालिस में आले मोहम्मद की ज़िकर की जाती है. सैयदनल काज़िन नोमान ने फरमाया है कि अइम्मत की ज़िकर करना खुदा की ज़िकर है. कुराने मजीद में आयत है कि “अला बेज़िक्रिल्लाहे ततमइन्नल कुलूब.” अइम्मत की ज़िकर से, आका हुसैन की ज़िकर से दिलों को सुकून होता है और वह गोया इबादत है. कुराने मजीद की आयातों में अइम्मत की ज़िकर है.

सैयदना (त.उ.श.) ने इब्राहीम (अ.स.) की खतानत की ज़िकर में जो तफसीर की गई है उसकी ज़िकर फरमाई और फरमाया कि वे लोग सिर्फ ज़ाहिर बयान से खुश हो जाते है. खास मआनी (अर्थ) वह उन्हें नहीं हासिल होती और यह मआनी सैयदना (त.उ.श.) ने बयान फरमाई और इसी तरह सिराते मुस्तकीम की माना (अर्थ) बयान फरमाई.

सैयदना (त.उ.श.) ने फरमाया कि दाई को इस्तिम्बात का हक है. इमामुज़ ज़मान के इलहाम और ताईद से इस्तिम्दाद करके सैयदना (त.उ.श.) ने “अल-सलाम” के ७ वुजूहात  बयान फरमाएँ. इल्म व हिकमत की नहर जारी फरमाई. पहले आप मौला ने फरमाया कि खुदा का नाम “अल-सलाम” है. खुदा का नाम ले तो अमान हो जाता है.

मुस्लिम व मोमिन की सिफत है कि उसके हाथ व ज़बान से दूसरों को अमान हो अर्थात मोमिन के कारण किसी और को तकलीफ न पोहंचे.

जन्नत को दारुस सलाम कहा जाता है क्योंकि जन्नत में कोई बीमारी, तकलीफ, मुसीबत नहीं है, और मौत से सलामती है.

इब्राहीम नबी (स.अ.) के अल्लाह पर तवक्कुल की शान निराली है. जब दुश्मन ने आपको मंजनीक में बिठाकर आग में फेंकने का इरादा किया तब खुदा ने आग को इब्राहीम पर “बर्दन व सलामन” कर दी, आग को बाग़ में तब्दील कर दिया. सैयदना कुतबुद्दीन (री.अ.) उस जगह में तशरीफ ले गए थे जहा आग को खुदा ने बुझा दी. सैयदना फखरुद्दीन ने फरमाया कि सैयदना कुतुद्दीन के तवक्कुल की शान भी निराली थी. इस जगह में आप तशरीफ ले गए और फिर सैयदना बुरहानुद्दीन (री.अ.) के वफात के बाद दुश्मनों ने फित्नत की आग सिल्गाई लेकिन खुदा ने उस आग को “बर्दन व सलामन” कर दी. दरुस सकीना के बाग़ में सुकून व इत्मिनान है.

हारिसे हमदान को मुश्किल कुशा अली (स.अ.) ने आग से बचाया. अली की वलायत के कारण जहन्नम से सलामती है.  

बाकी के ६ वुजूहात की आप मौला ने तफसीर से ज़िकर फरमाई.

कुराने मजीद की आयत “कज़ालिक जअलनाकुम उम्मतन वसता” पढके आप मौला ने फरमाया कि उम्मते वसत अइम्मत ताहेरीन है और उनके ताबेइन मुमेनीन को हमेशा संतुलन रखके ज़िन्दगी गुज़ारनी चाहिए और अतिरेक नहीं करना चाहिए. हुदात किराम ने दुनिया में किस तरह ज़िन्दगी गुज़ारनी चाहिए, इसके बारे में हिदायत दी है. ज़िन्दगी के हर पहलू में बेहतरी किस तरह प्राप्त होती है कि अतिरेक न करने से, बैलेंस रखने से. जैसे कि खाना खाने में थोड़ी भूख बाकी रखें. इसलिए अमीरुल मुमेनीन ने फरमाया है कि “कुम व अंत तश्तही”. व्यवसाय में भी इतने मशगूल न हो जाए कि पानी पीने की भी फुर्सत न हो या नमाज़ अदा करने का वक्त न हो. थोडा अमल करे लेकिन उसे मुसलसल पाबंदी से करे. वक्त कभी ज़ाए न करे, टीवी देखने में घंटो न बिताए. हाँ, राहत लेनी ज़रूरी है लेकिन यह सब संतुलन रखकर करना चाहिए. समय के ३ हिस्से करने चाहिए, एक अल्लाह की इबादत के लिए, एक हलाल की रोज़गार तलब करने के लिए और एक हलाल की लज्ज़तों के लिए - अहलो एयाल परिवार के साथ समय बिताएँ.

रसुलुल्लाह (स.अ.व.) ने फरमाया है कि इस्लाम की सुन्नत में से यह है कि “अफ्शुस सलाम” सलाम आवाज़ के साथ (ज़ोर से) पढ़े. “व अतएमुत तआम” दूसरों को खाना खिलाए और “वसिलुल अरहाम” कराबत के लोग (रिश्तेदारों) के साथ अच्छे संबंध रखे, जिस से उम्र लम्बी होती है और कतीअत करने से (रिश्ता तोड़ देने से) उम्र कम हो जाती है. जब लोग रात में आराम कर रहे हो तब नमाज़ पढ़े. सतर की दावत में खिदमत करे जिस से तुम्हारी कदर ज़ियादा होगी. तो फिर तुम जन्नत में अमान के साथ दाखिल हो जाओगे और फरिश्तें तुम पर सलाम पढेंगे.

आका हुसैन के दाई ने अजब दर्दनाक अंदाज़ से अब्बास अलमदार (अ.स.) की शहादत पढ़ी और इमाम हुसैन की शहादत पढ़ कर वाअज़ तमाम फरमाई.