अन्य शहरों में रहनेवाले मुमिनीन इमाम हुसैन और आप के एहले बैत और असहाब पर आई मुसीबत और उनकी सब्र और हिम्मत को याद कर इस मौके पर बरकात हांसिल करे, यह अमल करे

  • इमाम हुसैन के चेहलम के मौके पर मुमिनीन सैयदी मुकासिर साहेब सैयदी हुसैन भाईसाहेब बुरहानुद्दीन अ.अ.ब. की वाअज़ का रीले देखे.

हम आशूरा के दिन गुज़री मुसीबत को सदा याद करते है, इस गम से बढ़कर कोई गम नहीं। इमाम हुसैन के चेहलुम के मौके पर इस गम के साथ आशूरा के बाद इमाम हुसैन के हरम पर जो मुसीबतें गुज़री हम यह भी याद करते है। जो वाकेआत बरसो पहले घट चुके हो उनके नतीजे हम आज साफ़ साफ़ समझ सकते है। हम यकीन से जानते है कि करबला में कौन हक्क पर था और कौन नहीं और इन मुसीबतों के बावजूद आखिर हक्क ग़ालिब हुआ। आज जब हम खुद मुश्किल हालात से गुज़र रहे है, तब सही और गलत, हक्क और बातिल की परख करने की ज़िम्मेदारी, अपने लिए और अपनी आनेवाली नस्लों के लिए, हम में से हर एक पर है। खुदा पर तवक्कुल रखकर हक्क की राह पर चलना आसान नहीं मगर इसका अजर अज़ीम है। ऐसे वक्त में हम मौलातुना ज़ेनब अ.स. के अमल से सबक लेते है। आप ने यज़ीद के भरे दरबार में, खुले सर रहते हुए भी, खुदा पर तवक्कुल रख कर बेमिसाल हिम्मत से यह तिलावत की: “ काफेरीन यह न समझे कि हमने जो मोहलत उन्हें दी है वह उनके लिए खैर है, तहकीकन हमने उन्हें मोहलत दी है ताके व़े और भी गुनाह करे, उन के लिए सख्त अज़ाब है”। क्या हमें इमाम हुसैन और आप के एहले बैत और असहाब की कुर्बानी की याद, हक्क की हिमायत खातिर उनका मोहकम अज़म, हमें भी हक्क को यारी देने प्रेरित नहीं करता?

शेह्ज़ादा डॉ. अज़ीज़ भाईसाहेब के इस पूरे लेख,  The Ordeal After Aashura, (आशूरा के बाद  हालात) को पढने यहाँ क्लिक करें