२६ वी रजब के दिन सैयदना ताहेर फखरुद्दीन (त.उ.श.) ४७ वे दाई अल-मुतलक सैयदना अब्दुलकादिर नजमुद्दीन (री.अ.) के उर्स मुबारक की मजलिस में जलवा अफरोज़ हुए. मजलिस में सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) का कसीदा मुबारका “सका नौउन मिनत तकदीसे रमसा” और सलाम  की तिलावत हुई.

२७ वी रात, लैलतुल मेराज की रात में मौलानल मन्नान (त.उ.श.) ने मगरिब और इशा की नमाज़ इमामत से पढ़ाई. वशेक के बाद दाइल्लाहिल अमीन ने वसीला लेकर मुमिनीन के लिए कई दुआएँ फरमाई. मौलाना ने रसुलुल्लाह (स.अ.व.)  के मेराज की ज़िकर फरमाई. जब रसुलुल्लाह बैतुल्लाह से बैतुल मुक़द्दस सिधारे और फिर सात आसमान की ओर सिधारे. यह ज़िकर फरमाई कि सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) फरमाते थे कि खुदा ने रसुलुल्लाह को इतना करीब कर दिया – आँखों में बसा दिया. मौलाना ने मुमिनीन के लिए दोआ फरमाई कि खुदा मुमिनीन की हर एक उम्मीद पूरी कर दे. आप मौला ने इमाम हुसैन की शहादत पर वसीला तमाम फरमाया.

२७ वी रजब, मबअस के मुबारक दिन में, सैयदना ताहेर फखरुद्दीन (त.उ.श.) वाअज़ की मजलिस में जलवा नुमा हुए. कसीदा “ताहन नबीयुल मुस्तफा खैरुल वरा” की तिलावत हुई.

तख्ते इमामी पर जलवा नुमा होकर इमामुज़ ज़मान के दाई ने आले मोहम्मद के इल्म के जवाहिर से मुमिनीन को नवाज़ा. बयान में आपने फरमाया कि मुमिनीन कौन है कि जो कलेमतुश शहादत पढ़ते है, और अज़ान में “अशहदो अन्न मोहम्मदन रसुलुल्लाह” और “अशहदो अन्न मौलाना अलिय्यन वलीयुल्लाह” पढ़ते है. शहादत देते है कि मोहम्मद खुदा के रसूल है, जिन्होंने हमें तौहीद की तरफ हिदायत दी और यह शहादत देते है कि अली खुदा के वली है. जिनकी वलायत रसुलुल्लाह ने फरीज़त की है.

नमाज़ में तहियत जो दोआ पढ़ते है – “बअस हक्कुन, वल मौत हक्कुन.. साअत आतियतुन” – इस की माना आलिमे आले मोहम्मद ने बयान फरमाई. यौमुल बअस – बअस का दिन कियामत का दिन है.  यह दौर कियामत से जुड़ा हुआ है.

सैयदना त.उ.श. ने मबअस के दिन के रोज़े की ज़िकर फरमाई. इस दिन में रोज़ा करने से और मोतिउस सुआलात की दोआ पढके इफ्तार करने से ६० वर्ष के गुनाहों की कफ्फारत हो जाती है. मौलाना ने फरमाया कि हम अपने बच्चों को भी यह रोज़ा कराते है ताकि उन्हें भी रोज़े करने की आदत हो.

मौलाना ने अमीरुल मुमिनीन (स.अ.) की ज़िकर फरमाई. रसुलुल्लाह सोमवार के दिन मबूस हुए और दूसरे दिन – मंगलवार के दिन – अमीरुल मुमिनीन (स.अ.) इस्लाम लाए. आप पहले मर्द है जो इस्लाम लाए. औरतों में से पहले इस्लाम को जवाब मौलातोना खदीजा ने दिया, आपको रसुलुल्लाह के अज़ीम मक़ाम के बारे में मालुम था और आपने रसुलुलाह को पहली बार देखा तब से आप रसुलुल्लाह के बअस के इन्तिज़ार में थी.

मौलाना ने विस्तार से रसुलुल्लाह के मेराज की ज़िकर फरमाई कि इस दौर में कयामत के दिन तक जो भी होने वाला है, उन सब चीजों पर खुदा तआला ने रसुलुल्लाह को आगाह कर दिया. मौलाना ने फरमाया कि अंग्रेज़ी में नबी को “prophet” कहते है. Prophet  यानि वह जो आने ज़मान - मुस्तकबिल  की ज़िकर करे. रसुलुल्लाह ने यह अमल फरमाया. जैसे कि आपने इमाम मेहदी (अ.स.) के ज़ुहूर की तरफ इशारा करते हुए फरमाया कि ३०० साल बाद सूरज मगरिब से तुलु होगा, हिज्जतुल वदा में हजरे अस्वद  के पास खड़े रहकर हिंदुस्तान में दोआत मुतलकीन के मर्तबे की ओर उन्हें अपने भाई – इख्वान – कहकर इशारा किया. सच्चे नबी जो फरमाते है वह हमेशा हक की बाद, सच्ची बात होती है.

मौलाना ने “मोहम्मद” के लफ्ज़ की मआनी बयान फरमाई. यह लफ्ज़ के हर एक हर्फ़ के मम्सूल की ज़िकर फरमाई.

इस ज़िकर में फरमाया कि सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) के असरे मैमून में, सैयदना कुत्बुद्दीन ने एक तक़रीर में रसुलुल्लाह पर सलाम पढ़कर साथ ही अमीरुल मुमिनीन पर भी सलाम पढ़ा. सैयदना ताहेर सैफुद्दीन बहुत खुश हुए और आपने फरमाया कि इसी तरह अमल करना चाहिए. रसुलुल्लाह पर सलाम पढ़कर अमीरुल मुमिनीन पर सलाम पढना ही चाहिए. उसके बाद हम जब भी रसुलुल्लाह पर सलाम की बैत पढ़ते है तो उसके साथ हमेशा अमीरुल मुमिनीन पर सलाम की बैत पढ़ते है, इमामुज़ ज़मान पर सलाम की बैत पढ़ते है.  मौलाना ने “या बनिल मबूसे मिन आले कुसै” के कसीदे में से अब्यात तिलावत फरमाई.

मौलानल मन्नान ने मुमिनीन को हिदायत और मौएज़त (नसीहत) के कलाम सुनाए. आपने रसुलुल्लाह की हदीस बयान फरमाई कि अगर यह ४ अमल करने से जन्नत के दरवाज़े तुम्हारे लिए खुले होंगे:

१.    आवाज़ से सलाम पढो.

२.    लोगो को खाना खिलाओ

३.    आपस में मेल मिलाप से संबंध रखो. ख़ास तौर से रिश्तेदारों के साथ. लोगो के साथ संबंध नहीं तोड़ने चाहिए.

४.    रात में नमाज़ पढो जब दूसरे सो रहे हो. उसी तरह सतर के ज़माने में दावत को जवाब दो जब दूसरे लोग गाफिल हो.

मौलाना ने मुमेनीन के लिए दुआ फरमाई. बअस के लिए दोआ फरमाई कि हम जहाँ से आए है वहाँ फिर से लौट जाएँ. रसुलुल्लाह, आपने २८ लड़ाइयाँ लड़ी, आप का वसीला लेकर मौलाना ने नसरे अज़ीज़ और फतहे मुबीन के लिए दुआ फरमाई.

उसके बाद मौलाना ने यह ज़िकर फरमाई कि रसुलुल्लाह उम्मे सलमा के सपने में तशरीफ़ लाए और उम्मे सलमा को करबला के वाकिए की खबर सुनाई. मौलाना ने अजब शान से अली असगर (अ.स.) और इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत पढ़ी.