फातेमी इमाम के फातेमी दाई, सैयदना ताहेर फखरुद्दीन (त.उ.श.) २४ वे जुमादिल उखरा, सैयदना खुज़ैमां कुत्बुद्दीन के उर्स के मुबारक दिनों में इवाने फातेमी में हल्का सैफियाह की

ज़ियाफ़त में जलवा नुमा हुए. सैयदना जुलूस की शाकेलत में इवाने फातेमी में पधारे. आपके ऊपर तलबत ने ज़ीनत के लिए एक शानदार छतरी ओढाई थी, और आपके सामने तलबत परचम लेकर चल रहे थे जिन पर "نصر من الله و فتح قريب" और "انا فتحنا لك فتحا مبينا" की आयतें लिखी हुई थी. तलबत ने तलवारें भी पकड़ी थी. यह सब फतेमियीन के जुलूस के नमूने पर था. तलबत सैयदना (त.उ.श.) के आगे चल रहे थे और तालेबात सैयदना (त.उ.श.) के पीछे. सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) ने सैयदना बुरहानुद्दीन (री.अ.) की तरहीब में “अहलन व सहलन मरहबन मरहबा” का कसीदा तस्नीफ फरमाया था, वह कसीदे की सब तलबत तिलावत करते हुए जुलूस में चल रहे थे.

सैयदना (त.उ.श.) इवान में तशरीफ़ लाए और तज़यीन की तरफ नज़र फरमाई. तज़यीन में लकड़े से बना हुआ एक सफीना रखा गया था जिस पर सैयदना अली बिन हंज़ला (री.अ.) की यह बैत खुशगवार खत में नक्श की गई थी:

अइम्मत ताहेरीन गुमराही और बिदअत के तूफ़ान में नजात का सफीना है. उन के सबब कियामत के दिन के खौफ से मुमिनीन को अमान है.

सफीने के पर्दों पर कुरआन मजीद की आयतें खुशगवार खत में लिखी हुई थी. इस सफीने की डिज़ाइन हल्का सैफियाह के एक तलबत ने बनाई थी. सफिने के पीछे एक तूफानी समुद्र चित्रित था.

फातेमी दावत के सफीने को, नजात के सफीने को इमामुज़ ज़मान की ताईद से सैयदना खुज़ैमां कुत्बुद्दीन (री.अ.) और आपके बाद सैयदना ताहेर फखरुद्दीन (त.उ.श.) फितनत के तूफ़ान  में चलाते रहे.

अज़ीज़ भाई भायगोरा ने ज़ियाफ़त की मजलिस में कुरआन मजीद की तिलावत की. उन्हें शेह्ज़ादी बज़त तैयेबा बाईसाहेबा से शिक्षा हांसिल है. उसके बाद तलबत ने शेह्ज़ादी डॉ. बज़त सैफियाह बाईसाहेबा की लिखी हुई मदेह पढ़ी. इस मदेह में सफीनतुन नजात का ज़िक्र है. उसके बाद एक बाद एक तलबत ने अपने अपने लेखन इखलास और जज़्बे के साथ अर्ज़ किए – शुकुर की तकरीरें, मदेह और अंग्रेज़ी में शायरी अर्ज़ की. सबक में जो उन्हें मारेफ़त हासिल हुई है उसकी बरकात ज़ाहिर हो रही थी. सारे तलबत ने, उन्हें जो आले मोहम्मद के इल्म की अज़ीम नेमत मिली है उसके लिए हज़रत इमामिया में शुकुर अर्ज़ किया.

तलबत ने एक स्किट पेश की. दीन के बारे में लोगों का नज़रिया ३ तरह का होता है, इसे पुरलुत्फ़ अंदाज़ में पेश किया. ज़ियादती और लापरवाही दोनों में नुकसान है. सही फल्सफत यह है कि शरीअत की जो मध्यस्थ राह है उस पर चले अर्थात दीन और दुनिया दोनों में संतुलन रखे.

उसके बाद तलबत और तालेबात ने रसुलुल्लाह (स.अ.व.) की नात में “क़सीदतुल बुर्दा” की अरबी लेहेन में तिलावत की. हाज़रीन को यह तिलावत बहुत पसंद आई. उसके बाद शरबत और वधाने की रसम हुई.

सैयदना ने नूरानी कलेमात से तलबत को नवाज़ा. सैयदना ने तलबत की पुर ख़ुलूस अर्ज़ सुन कर और खुश हो कर सब के लिए बहुत दुआएँ फरमाई. बयान में आप मौला ने फरमाया कि आले मोहम्मद का इल्म ऐसा दरिया है जिसका किनारा नहीं है और यह इल्म हयात अबदिया (हमेशा की हयात) का सबब है. रसुलुल्लाह (स.अ.व.) ने फरमाया है कि इल्म हासिल करने के लिए ४ चीज़ ज़रूरी  है. १) खामोश रहना (सम्त), २) ध्यान से सुनना (इस्तिमा), ३) याद करना (हिफ्ज़) और नशर करना, इल्म पढ़ाना (नशर). सैयदना ने दावत में जो इल्म की नेहेज है उसकी अहम्मियत की ज़िकर करते हुए सैयदना अब्देअली सैफुद्दीन (री.अ.) के दरसे सैफी की ज़िकर फरमाई और सैयदना ताहेर सैफुद्दीन (री.अ.) ने जामेआ सैफिया बनाई उसकी ज़िकर फरमाई. जामेआ सैफिया की ज़िकर करके सैयदना ने फरमाया कि सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) के शेह्ज़ादी, ज़ुमुर्रुदतो दावतिल हक़ शेह्ज़ादी डॉ. बज़त सैफिया बाईसाहेबा के सबकों में “सैफिया” नाम की बरकात जारिया है. सैयदना कुत्बुद्दीन ने इन सबकों को “हल्का सैफिया” का नाम अता फरमाया.

तलबत और तालेबात को सैयदना की क़दमबोसी का शरफ हासिल हुआ और तशरीफ़ में सैयदना ने तलबत को यमनी अकीक इनायत फरमाएँ. नमाज़ के बाद सैयदना ज़ियाफ़त के थाल पर तशरीफ़ लाए, हल्का सैफिया के तालेबात ने ज़ियाफ़त के लिये अलवान तैयार किए थे.

हल्का सैफिया को १७ साल से हर साल शुकुर की ज़ियाफ़त करने का शरफ हासिल हो रहा है. हम अल्लाह तआला का हम्द और शुकुर करते है और सैयदना बुरहानुद्दीन (री.अ.), सैयदना कुत्बुद्दीन (री.अ.) और आपके वारिस सैयदना ताहेर फखरुद्दीन (त.उ.श.) को शुकुर अर्ज़ करते है कि आपने हल्का सैफिया के तलबत को यह अज़ीम नेमत अता फरमाई. यह दोआ करते है कि फखरुद्दीन मौला, इमामुज़ ज़मान के नाइब और हिजाब, हमेशा यह ज़ियाफ़त की नेमत हमें अता फरमाते रहे. आमीन.