सैयदना फखरुद्दीन ने अरफ़ा के दिन और ईदुल अदहा की रात नमाज़ पढाई और ईद के दिन दारुस सकीना, बेकरसफिल्ड में ख़ुत्बे की नमाज़ पढ़ाई. सैयदना ने तमाम मुमिनीन के लिए अपने वसीले में दोआ फ़रमाई. उसके बाद सैयदना ने ईदुल अदहा की ख़ुशी की मजलिस एक मुमिन मुख्लिस के घर में अक़्द फ़रमाई और ज़बीहत फ़रमाई.

मुंबई में सैयदना की रज़ा से हिज़्बे खलीलुल्लाह ने क़ुरबानी का प्रोग्राम और गोश तकसीम करने का प्रोग्राम किया. दारुस सकीना में शेह्ज़ादा डॉ. अब्देअली भाईसाहब सैफुद्दीन ने ईद की नमाज़ पढ़ाई और वसीला लेकर दोआ फ़रमाई. उसके बाद ईद की ख़ुशी की मजलिस और हिज़्बे खलीलुल्लाह का प्रोग्राम अक़्द फ़रमाया.

यह वर्ष ९४ कुर्बानियाँ  हुई और उसका गोश २००० से ज़ियादा घरो में हिज़्बे खलीलुल्लाह के मेम्बरों के तकसीम किया. हिज़्बे खलीलुल्लाह का मकसद यह है कि :

  • कुर्बानी के बकरे शरीअत के अहकाम के मुताबिक़ हो. 
  • कुर्बानी का गोश मुमिनीन और मुस्लेमीन के घरों में, खास तौर से गरीब जगहों में एहतेराम के साथ तकसीम हो. 
  • कुर्बानी और तकसीम के प्रोग्राम का मकसद यह भी है कि मेम्बरों के दरमियान मोहब्बत, तआवुन और इज्तेमाई बेह्बूदगी का माहौल कायम हो.

ईदुल अदहा के प्रोग्राम के उमूर वित्तीय अदद, जैसे बकरों की रकम, उन्हें रखने की, ज़बीहत की, साफ़ करने की रकम और गोश तकसीम करने की रकम, प्रोग्राम की मुद्दत, किन जगहों में गोश तकसीम हुआ, इन चीज़ों का एक रिपोर्ट सैयदन त.उ.श. की इच्छा के अनुसार तैयार हुआ है. सैयदना त.उ.श. का यह इरशाद है कि दावत के सभी इदारे जो कायम है वे ज़िम्मेदारी और जवाबदेही के साथ खिदमत बजाएँ।