सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. ने करम फरमा कर बोस्टन, अमेरिका, में अशरा मुबारका की खिदमत के लिए हाफिज़ुल कुरआन शेह्ज़ादा डॉ. अज़ीज़ भाईसाहेब कुत्बुद्दीन को रज़ा फरमाई। शेह्ज़ादा डॉ. अज़ीज़ भाईसाहेब ने पांचवी मोहर्रम से यौमे आशूरा १४४० हि तक वाअज़ फरमाई।

पांच वी मोहर्रम की वाअज़ में आप ने मुमिन की पहचान के बारे में ज़िक्र फरमाई, मुमिन कौन कि जो पंजेतन पाक, अइम्मत ताहेरीन और दोआत मुतलकीन की मारेफ़त करे। यह मान्यता रखते हो कि हर ज़मान में रसूलुल्लाह स.अ. की नसल में इस ज़मीन पर एक इमाम हाज़िर और मौजूद है, और जिस वक्त इमाम परदे में मुस्ततिर हो तो दोआत मुतलकीन तैयब इमाम के नाम से दावत कर के मुमिनीन को हक के रास्ते की तरफ हिदायत देते है। अपने ज़मान में दाई सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. हमे पंजेतन, अइम्मत और दोआत की मारेफ़त कराते है। शेह्ज़ादा अज़ीज़ भाईसाहेब ने बयान फरमाया की यह सिलसिला एक इमाम से दुसरे इमाम, एक दाई से दुसरे दाई, हबलुल्लाह – खुदा का रस्सा है, जो हर मुमिन को अल्लाह तआला के साथ जोड़ता है। हबलुल्लाह कभी मुनकते नहीं होगा, टूट नहीं सकता। कुरआने मजीद में खुदा का अमर है की खुदा के रस्से से जुड़ें रहो।

पांच वी मोहर्रम की वाअज़ में आप ने अन्बिया की अखबार ज़िक्र फरमाई। एक बाद एक नातिक नयी शरीअत लेकर आए ताके मोहम्मद मुस्तफा की शरीअत कामेला (मुकम्मल), जिस तरह माँ के पेट में बच्चा क्रमशः तैयार होता है, ताके आखिर जन्म होता है।

अन्बिया की ज़िक्र में खासकर मूसा नबी अ.स. की डांग की तोजी बयान फरमाई। इसमें पांच वजह की ज़िक्र की। कुरआन मजीद की आयत पढ़ी जिस में वालेदैन – माँ बाप की ज़िक्र है और मवाली ताहेरीन ने वालेदैन के एहतेराम और खिदमत की ज़िक्र फरमाई है वह बयान फरमाया। हमारे अवलिया हिदायत देते है कि माँ बाप की उम्र बढ़ते उनके फ़रज़न्दो पर वाजिब है कि उनका ध्यान रखे, जैसे माँ बाप जिस वक्त फरजंद छोटे थे उस वक्त उनका ध्यान रखते थे।

छ ठी मोहर्रम की वाअज़ में शेह्ज़ादा अज़ीज़ भाईसाहेब ने रसूलुल्लाह स.अ. के अखबार की ज़िक्र फरमाई। मुमिनीन को पयगम्बरे हक की मारेफ़त कराई। जो लोग कहते है कि ‘मैं और मेरे खुदा’, यह नज़रिया सही नहीं। खुदा ने रसूल को भेजा और मोहम्मद को हुकुम फरमाया की, “कहो अगर तुम खुदा को मोहब्बत करते हो तो मेरी ताअत करो”, रसूल को ताबे हो तो ही खुदा की मोहब्बत सही है, और रसूलुल्लाह स.अ. ने फरमाया कि मैं तुम से कोई अजर नहीं चाहता मगर यह कि मेरे एहले बैत की तुम मोहब्बत करो। अइम्मत को ताबे हो तो रसूलुल्लाह के साथ, और सतर में दोआत को ताबे हो तो अइम्मत के साथ।

शेह्ज़ादा साहेब ने वाअज़ में मिसाक की एहेम्म्मियत की ज़िक्र फरमाई और ख़ास कर इमाम उज़ ज़मान के दाई को मिसाक दे तो यह खुदा का एहेद और मिसाक है, जिस के सबब ही नजात है।

मोहम्मद रेहमतुन लिल आलमीन है, खुदा ने रेहमत के दो हिस्से बनाएं।

"يؤتكم كفلين من رحمته" इस आयत की पांच फसल बयान की, और मुमिनीन को हिम्मत दिलाई कि कभी खुदा की रेहमत से मायूस न हो।

सात वी मोहर्रम की वाज़ में शेह्ज़ादा अज़ीज़ भाईसाहेब ने मौलातुना फातेमा की शान की ज़िक्र फरमाई और बयान किया कि आप अमीरुल मुमिनीन के हुज्जत है, अइम्मत ताहेरीन के माँ साहेबा है। आप का मकाम बहुत बलंद है। मौलातुना फातेमा की शादी मौलाना अली से हुइ इसकी एहेम्मियत बयान की और वाअज़ में वसीला और दोआ के महत्त्व का ज़िक्र किया। मौलातुना फातेमा के साथ वसल कर के दोआ और वसीले की कुछ ज़िक्र फरमाई, जिस में एक यह कि आप ने वफ़ात के पहले मुमिनीन के हक में बहुत दोआ फरमाई। शेह्ज़ादा अज़ीज़ भाईसाहेब ने इमाम अली ज़ैनुल आबेदीन की दोआओं की भी ज़िक्र की। आप ने सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन और सैयदना कुत्बुद्दीन की दोआ मुबारक का असर जो आप ने खुद अनुभव किया इसकी भी ज़िक्र फरमाई। मौएज़त का बयान किया के मुमिनीन दाई की दोआ की कदरो कीमत पहचाने और इसका शुकुर करे। इखलास से दोआ की तलक्की करे तो दोआ का असर ज़िन्दगी में हो।

नव वी मोहर्रम की वाअज़, हसन इमाम  की वाअज़ है, शेह्ज़ादा अज़ीज़ भाईसाहेब ने इमाम हसन के फ़ज़ाइल बयान किये। इस वाअज़ में आप ने निराले अंदाज़ में ‘मआद’ लफ्ज़ की तोजी बयान की। बयान में शेह्ज़ादा अज़ीज़ भाईसाहेब ने अइम्मत के नामो की तस्बीह की और मुख़्तसर में दोआत मुतलकीन की तारिख की ज़िक्र की, दोआत की शानात और मुमिनीन के लिए दावत काइम करने में दोआतों ने जो कुर्बानियाँ दी उनका ज़िक्र किया।

हर वाअज़ के तमाम के नज़दीक शेह्ज़ादा अज़ीज़ भाईसाहेब ने इमाम हुसैन की पुरदर्द शहादत पढ़ी, हर एक मुमिन की आँख से आंसू बह जाते, और ‘या हुसैन’ निदा कर सब मातम करते थे। हर वाअज़ में ज़िक्र की कि हम मुमिनीन के तकदीर की बलंदी है कि साहेबुज़ ज़मान की शफाअत अपने नसीब में है।

मुमिनीन पर शेह्ज़ादा अज़ीज़ भाईसाहेब की वाअज़ का गहरा असर था। जो मजलीस में हाज़िर हुए उन्हें नेअमत का एहसास हुआ कि हम मुमिन है और इस मजलीस में शामिल हुए है यह भी अज़ीम नेअमत है। हाज़ेरीन मुमिनीन के दरमियान मोहब्बत का माहौल था और इन दिनों में यह मोहब्बत और भी गहरी हुइ। हर रोज़ मुमिनीन ने आका हुसैन अ.स. की मुसीबत याद की और आंसू रवां किये, इमाम हुसैन ने दीन के खातिर सब कुरबान कर दिया। इमाम हुसैन की कुरबानी याद कर हक के खातिर क़ुरबानी देने हौंसला बलंद हुआ।

अशरा मुबारका में शेह्ज़ादा अज़ीज़ भाईसाहेब ने अवलियाउल्लाह के अखबार बयान फरमाए, आले मोहम्मद और आप के दोआत के इल्म की बरकात मुमिनीन ने हांसिल की। आशूरा के दिन अजब वलवले के साथ मकतल का बयान किया और करबला का मंज़र मुमिनीन की आँखों के सामने आ गया। अजब शानसे आशूरा के दिन मुमिनीन को इमाम हुसैन स.अ. की शहादत पढ़ कर सुनाई।

इमाम हुसैन और आप के एहले बैत और असहाब ने यजीद के हाथों करबला में जो मुसीबते सही यह ज़िक्र की। मुमिनीन ने आहोज़ारी कर के आंसू बहाये और इमाम हुसैन का पुरजोश मातम किया। शेह्ज़ादा अज़ीज़ भाईसाहेब ने जज़्बे से और भारी वलवले से जो बयान किया इसका हर एक मुमिन के दिल पर गहरा असर था, और हर एक ने आंसू बहाकर जन्नत में दरजात हांसिल किए।

मुमिनीन ने इन नेमतो पर हज़रत इमाममियाह में शुकुर के सजदात अर्ज़ किये।

खुदा तआला हमारे मौला सैयदना ताहेर फखरुद्दीन की उमरे शरीफ को तारोज़े क़यामत दराज़ करे। खुदा तआला शेह्ज़ादा अज़ीज़ भाईसाहेब को अफ्ज़लुल जज़ा अता करे और सैयदना त.उ.श. के साये में बाकी रखे।