सैयदना खुज़ैमां कुत्बुद्दीन रि.अ. का तीसरा उर्स मुबारक : २३ वी जुमादल उखरा १४४० हि. (नसीमो बरकातिल उर्सिल मुबारक)

५३ वे दाई अल मुत्लक़ के तीसरे उर्स मुबारक में मुमिनीन ने सैयदना खुज़ैमा कुत्बुद्दीन रि.अ., अपने वालिदे मुश्फिक के एहसानों को याद किया, आपके फ़ज़ाइल और आपकी शानात को याद करके शुक्र किया. इन मुबारक अय्याम में बरकात हासिल करने के लिए और सैयदना कुत्बुद्दीन रि.अ. की ज़ियारत करने के लिए हिंदुस्तान और विदेश से सैकड़ों लोग दारुस सकीना हाज़िर हुए.

दारुस सकीना थाना में सैयदना कुत्बुद्दीन रि.अ. के मज़ारे अक़दस में तीन रात ख़त्मुल कुरान की मजलिस अक़्द हुई. उर्स मुबारक के दिन रौज़ा कुत्बीया के साए में ख़त्मुल कुरान की मजलिस हुई. जुमादल उखरा की २१ वी  रात और २२ वी रात की मजालिस ईवाने फातेमी में हुई. इन मजालिस में सैयदना कुत्बुद्दीन रि.अ. की नीयत पर और आपकी याद में ख़त्मुल कुरान की तिलावत हुई, मरसियों की तिलावत हुई और इमाम हुसैन स.अ. का मातम हुआ. २२ वी रात की मजलिस में शेह्ज़ादा डॉ. हुसैन भाईसाहब बुरहानुद्दीन ने सैयदना कुत्बुद्दीन रि.अ. की शानात और आपके एहसानों को याद करते हुए एक पुर असर तक़रीर फ़रमाई. इस तक़रीर में आपने ५३ के अदद की फुसूल बयान फ़रमाई. आपकी तक़रीर के बाद एक मुमिन मुखलिस शेख अब्दुल हुसैन इब्राहीम ने तक़रीर की जिसमे उन्होंने सैयदना कुत्बुद्दीन के साथ अपने अनुभवों का ज़िकर किया. मजलिस के बाद मुमिनीन ने नियाज़ और सलवात का तआम तनावुल किया. मुमिनीन ने इन अय्याम में रात दिन सैयदना कुत्बुद्दीन रि.अ. की ज़ियारत का शरफ हासिल किया.

जुमादल उखरा की २३ वी रात, उर्स मुबारक की रात, ईवाने फातेमी में सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. ने मगरिब और ईशा की नमाज़ पढ़ाई और उसके बाद आप मौला उर्स मुबारक की मजलिस में जलवा अफ़रोज़ हुए. मजलिस में ख़त्मुल कुरान की तिलावत हुई. उसके बाद आप मौला ने सदकल्लाह की दुआ की तिलावत फ़रमाई और उसके बाद सैयदना कुत्बुद्दीन रि.अ. की याद में “सलामुन अलैक अ कुत्बल हुदा” और दूसरे मरसियों की तिलावत हुई.

मजलिस के बाद सैयदनल मिनआम त.उ.श. ने तख्ते इमामी पर जलवा नुमा होकर अजब शान से वाअज़ मुबारक फ़रमाई. इमामुज़ ज़मान की ताईद सैयदना की वाअज़ में नुमाया थी. सैयदना ने वाअज़ मुबारक में कुराने मजीद की ४ आयात की तिलावत की और ४ मक़ामात की ज़िकर फ़रमाई: नबी, वसी, इमाम और दाई. आपने सैयदना क़ुत्बुद्दीन के निराले मकाम की ज़िकर फ़रमाई और मुमिनीन के दरजात को बलन्द किया. सैयदना ने तमाम मुमिनीन मुमिनात और प्यारे फ़रज़न्दों के लिए बहुत दुआएँ फ़रमाई और इमाम हुसैन स.अ. की शहादत पर वाअज़ मुबारक तमाम फ़रमाई.

वाअज़ मुबारक इंटरनेट के माध्यम से आलमे ईमान में रिले की गई थी ताकि सभी मुमिनीन बरकात हासिल कर सकें.

हम वाअज़ मुबारक की २ क्लिप्स यहाँ पेश करते हैं:

दाई के जनाज़े की ज़िकर - सैयदना फखरुद्दीन त.उ.श. ने सैयदना ताहेर सैफुद्दीन रि.अ. के बयान मुबारक में से ४८ वे दाई सैयदना अब्दुल हुसैन हुसामुद्दीन रि.अ. के इन्तिकाल और दफ़न के बारे में ज़िकर फ़रमाई. सैयदना हुसामुद्दीन रि.अ. का इन्तिकाल अहमदाबाद में हुआ और उस वक्त ४९ वे दाई सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन रि.अ. मुंबई में थे और आप सैयदना हुसामुद्दीन रि.अ. के जनाज़े पर अहमदाबाद नहीं जा पाए.

क्या मूसा काज़िम मन्सूस थे? - सैयदना त.उ.श. ने इस सवाल के बारे में ज़िकर फ़रमाई, और उसके बारे में ५ वे दाई सैयदना अली बिन मोहम्मद के बयान में से बयान फ़रमाया.

वाअज़ मुबारक के बाद सैयदना त.उ.श. सैयदना कुतबुद्दीन रि.अ. की ज़ियारत के लिए रौज़ा मुबारका में तशरीफ़ ले गए. आपके चारों ओर मुमिनीन मुमिनात मौजूद थे. आपने कब्र मुबारक पर संदल चढ़ाया और फूलों की चादर चढ़ाई.

उर्स मुबारक के दिन सैयदना फखरुद्दीन त.उ.श. सैयदना कुतबुद्दीन रि.अ. के रौज़े के सेहेन में जलवा अफ़रोज़ हुए, यहाँ जन्नत की खुशबू महक रही थी. उर्स मुबारक के दिन सैयदना इस्माईल बदरुद्दीन रि.अ. और सैयदना कुतबुद्दीन रि.अ. की नीयत पर ख़त्मुल कुरान की मजलिस हुई और उसके बाद मरसियों की तिलावत हुई.

२१ वी और २२ वी जुमादल उखरा के दिन, पहली बार तमाम आलम के मसूलों का इज्तेमा हुआ. उसके इफ्तेताह में सैयदना त.उ.श. ने बयान फ़रमाया जिसमें आपने मसूलों को उनकी मसूलियत और उनकी जिम्मेदारिओं की अहम्मियत के बारे में नसीहत फ़रमाई. अलग अलग जगहों के मसूलों ने अपने अपने अनुभवों के बारे में ज़िकर किया और दावत की खिदमात किस तरह ज़ियादा से ज़ियादा की जाए और मुमिनीन की खैर ख़्वाही किस तरह ज़ियादा से ज़ियादा की जाए, उसके बारे में अपने अपने विचार पेश किए.

खुदा तआला जन्नतुल फिरदौस में सैयदना कुत्बुद्दीन रि.अ. की तरफ हमारा सलाम पहुँचाए और आपके वारिस, सैयदना फखरुद्दीन त.उ.श. की उम्र शरीफ को क़यामत के दिन तक दराज़ करें. आप मौला मुमिनीन को जन्नत की तरफ हिदायत देने के लिए हमेशा बाकी रहे और आपको खुदा तआला नसरे अज़ीज़ और फ़तहे मुबीन अता करें. आमीन या रब्बल आलमीन.