जिहाद इस्लाम के सात देआमत में से एक देआमत है. हर मुमिन पर वाजिब है, फ़र्ज़ है. लेकिन जिहाद की माअना क्या है?

कुराने मजीद में खुदा तआला फरमाते हैं कि ‘क्या तुम यह समझते हों कि तुम जन्नत में दाखिल हो जाओगे?’ आगे फरमाते हैं कि ‘यह नहीं होगा जब तक खुदा देखेंगे - जानेंगे - कि तुम में से जिहाद किसने की, सब्र किसने किया’ (सुरते आले इमरान:१४२). खुदा तआला ने जिहाद और सब्र को जोड़ दिया और जिहाद को जन्नत में दाखिल होने की एक शर्त बनाई. तो यह जिहाद कैसी है ?

रसुलुल्लाह स.अ.व. ने २८ लड़ाइयाँ लड़ी. एक जंग के बाद जब आप मदीना तशरीफ़ लाएँ तब आपने फ़रमाया कि छोटी जिहाद से बड़ी जिहाद की तरफ हम आए हैं. आपके साथ जो लोग थे उन्होंने रसुलुल्लाह को फ़िक्र में पूछा कि अब कौन सी बड़ी जिहाद बाकी है क्योंकि अभी अभी तो जान पर खतरा हो ऐसी जंग करके आए है. रसुलुल्लाह ने जवाब में क्या फ़रमाया? हम अपनी ज़िंदगी में उस हिदायत को कैसे अपनाएँ?

सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. इस सवाल का जवाब तीन हिस्सों में फरमाते हैं. मजालिसुल हिक्मत की १४ वी मजलिस में इस जवाब का पहला हिस्सा जो ‘जिहादे अकबर’ है उसका बयान फरमाते है. जवाब के बाकी के दो हिस्से १५ वी और १६ वी मजलिस में फरमाएँगे इंशाअल्लाहो तआला.