खुदा तआला कुराने मजीद में फरमाते हैं “وَمَا خَلَقْتُ ٱلْجِنَّ وَٱلإِنسَ إِلاَّ لِيَعْبُدُونِ” सुरतुज़ ज़ारियात आयत ५६, मैंने जिन्न और इन्स को मेरी इबादत के लिए पैदा किया है. इस आयत की तिलावत करके यह लगता है कि पैदा करने की गरज़ यह है कि खुदा की बंदगी. यदि पैदा करने में ख़ालिक़ की कोई गरज़ है तो वे खुद मोहताज हैं, और जो मोहताज होते है वे नाकिस होते है. हाशा लिल्लाह - खुदा नाकिस हो ही नहीं सकते, खुदा मोहताज हो ही नहीं सकते, खुदा की कोई गरज़ हो ही नहीं सकती. लेकिन इस आयत में तो यही कहा है. तो उसकी माअना क्या है? इसका जवाब क्या है?

बंदगी किस तरह करनी चाहिए? बंदगी में नीयत क्या होनी चाहिए? इबादत दो (२) तरह की है: इबादत इल्मीया और इबादत अमलीया - दोनों में फर्क क्या है? दोनों इबादतें ज़रूरी क्यों है?

ऐसा लगता है कि यह एक साधारण सवाल है लेकिन जब इसकी मअना बयान होती है तब इल्म होता है कि इसके जवाब में हिक्मत के मोती और हकीकत के असरार छिपे है. मजालिसुल हिक्मत की १७ वी मजलिस में सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उश. इन सवालों के जवाब फरमाते हैं.