क़ुराने मजीद में खुदा तआला फरमाते हैं कि नहीं है खुदा मगर वह.

अलग अलग मज़हब है, इस्लाम में अलग अलग फ़िर्क़ें हैं, खुदा के बारे में सबकी मान्यता अलग है, मगर सही तौहीद किस तरह करनी चाहिए? तौहीद की हकीकत क्या है? हुदात किराम ख़ास तौर से अमीरुल मुमिनीन मौलाना अली स.अ. ने अपने ख़ुत्बों में तौहीद के बारे में क्या फ़रमाया हैं?

खुदा तआला क़ुराने मजीद में यह भी फरमाते हैं कि जो खुदा में भागीदारी करता है - शिर्क करता है - उस शिर्क के गुनाह को खुदा कभी माफ़ नहीं करते. सैयदनल मोऐयदुश शीराज़ी रि.अ. इरशाद फरमाते हैं कि शिर्क २ किस्म का होता है: जली - जो सबको नज़र आता है और ख़फ़ी: जो छुपा हुआ है. दोनों में क्या फर्क है? और दोनों किस्म के शिर्क से किस तरह बचें?

मजालिसुल हिक्मत की ४१ वी मजलिस में सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. इन सवालों के जवाब फरमाते हैं.