यह मारूफ है कि ईदुल फितर का दिन एक ख़ास दिन है. ख़ुशी का दिन है. एहतेफाल का दिन है. लेकिन उसका सबब क्या है? उसमें हिक्मत क्या है? शरीअत के साहेब ने ईद के दिन का फज़ल क्यों इख़्तियार किया?

पहले तो यह सवाल कि ईद कब है?
रसुलुल्लाह शेहरे रमज़ान के पहले जंग के लिए तशरीफ़ ले जा रहे थे तो मुस्लिमीन ने आपको यह अरज़ की कि हम आपको देखकर रोज़े करते थे और आपको देखकर इफ्तार करते थे. अब कैसे करे? रसुलुल्लाह ने फ़रमाया की उसे देखकर रोज़े करो और उसे देखकर इफ्तार करो. एहलुज़ ज़ाहिर यह कहते है कि चाँद को देखकर रोज़े करने की और इफ्तार करने की मुराद है. यदि ज़ाहिर में चाँद देखने की मुराद है तो कभी कभी बादलों के सबब चाँद नज़र ही नहीं आते और उसके सबब उम्मत में अलग अलग दिन ईद मनाई जाती है. अगर ईद के दिन रोज़ा रखना हराम है तो यह किस तरह हो सकता है कि एक जगह ईद और एक जगह नहीं?

मजालिसुल हिक्मत की १२ वी मजलिस में सैयदना फखरुद्दीन त.उ.श. इन सवालों के जवाब फरमाते हैं.