खुदा तआला कुराने मजीद में फरमाते हैं कि “खुदा ज़ुल्म करनेवालों को पसंद नहीं करते”, तो ज़ुल्म यानी किसी तो तकलीफ देना, दूसरों का हक़ छीनना, नाहक किसी का क़त्ल करना, यह ज़ुल्म कहलाता है. यह सही है लेकिन ज़ुल्म का असल क्या है? इस लफ्ज़ की गहरी माअना क्या है?

खुदा तआला कुराने मजीद में “ज़ुल्म” और “ज़ालेमीन” की कई आयतों में ज़िक्र फरमाते हैं. एक आयत में खुदा फरमाते हैं कि ‘खुदा में शिर्क या भागीदारी करना यह बहुत बड़ा ज़ुल्म है.’ मख़लूक़ की क्या ताकत कि खालिक पर ज़ुल्म करें? तो इंसान का शिर्क करना यह खुदा पर ज़ुल्म किस तरह? इस आयत की माअना क्या है?

खुदा तआला कुराने मजीद में यह भी फरमाते हैं कि ‘खुदा बिलकुल ज़ुल्म नहीं करते’ लेकिन हम देखते हैं कि दुनिया में ज़ुल्म होता है. तो खुदा यह क्यों होने देते हैं? ज़ालेमीन को छूट क्यों है?

खुदा तआला ईमान लाने वालों को एक आयत में फरमाते हैं कि ‘मुमिनीन कौन है कि जो अपने ईमान को ज़ुल्म के कपडे नहीं पहनाते.’ ज़ुल्म के कपडे नहीं पहनाते, इसकी माअना क्या है? ज़ुल्म करने से किस तरह बचें? दुनिया में ज़िन्दगी इस राह पर किस तरह गुज़ारें? अवलिया किराम के इस बारे में क्या इरशादात हैं?

मजालिसुल हिक्मत की ५९ वी मजलिस में सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. इन सवालों के जवाब फरमाते हैं.