कुराने मजीद में खुदा तआला फरमाते हैं कि यदि आपस में कोई झगड़ा हो तो खुदा और खुदा के रसूल के पास आओ (सुरतुन निसा ५९ वी आयत). रसुलुल्लाह स.अ.व. के वफ़ात बाद झगड़े और इख्तिलाफ बंध नहीं हो गए. अगर रसुलुल्लाह का कोई वारिस नहीं है तो इस आयत की माअना क्या है? एक छोटे दुकानदार को भी यह फ़िक्र होती है कि उसके बाद उसकी दुकान कौन चलाएगा. क्या रसुलुल्लाह को यह फ़िक्र नहीं थी?

पिछली मजलिस में सैयदना ताहेर फखरुद्दीन त.उ.श. ने यह बयान फ़रमाया कि हर ज़मान में खुदा के तरफ से एक हादी का मौजूद होना ज़रूरी है ताकि उनसे हिदायत लेकर नजात हांसिल हो.

तो आज खुदा के वली कौन है? उन्हें हम किस तरह पहचाने? उनकी निशानी क्या है? सच्चाई और हक़ के दावे करने वाले बहुत है. अलग अलग मज़हब के लोग उनकी तबाअत करते है. साहेबुल हक़ कौन है यह किस तरह पहचाने?