सैयदना खुज़ैमा कुत्बुद्दीन रि.अ. के दुसरे उर्स मुबारक के मौके पर, जो मिसाल शरीफ़ सैयदना ताहेर सैफुद्दीन ने २४ वी रबी उल आखर १३८० हि (१९६०), मुंबई से सैयदना कुत्बुद्दीन को उदैपुर, अपने हाथ मुबारक से लिख कर भेजा था, उसका तर्जुमा पेश करते है । असल मिसाल शरीफ़ अरबी ज़बान में है । सैयदना कुत्बुद्दीन (उस वक्त शेह्ज़ादा खुज़ैमा भाईसाहेब) उदैपुर में तशरीफ़ रखते थे जहां आप ने दो महीने पहले, पहली बार अशरा मुबारका की वाअज़ फरमाई थी। सैयदना ताहेर सैफुद्दीन ने अपने हाथ मुबारक से इस मिसाल को लिखा। इस तरह अपने हाथ मुबारक से लिख कर, दुसरे किसी और को कभी भी सैयदना ताहेर सैफुद्दीन ने ख़त नहीं लिखा है ।

इस मिसाल शरीफ़ में सैयदना ताहेर सैफुद्दीन रि.अ. सैयदना कुत्बुद्दीन जो बलंद मकाम में पहुँचने वाले है उसकी पेशनगोई फरमाते है, सैयदना कुत्बुद्दीन ने वलीउल्लाह इमाम उज़ ज़मान की ताईद से वाअज़ फरमाई, यह ज़िक्र सैयदना ताहेर सैफुद्दीन इस मिसाल शरीफ़ में फरमाते है।

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Misaal Syedna Burhanuddin

इस तस्वीर में सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन सैयदना खुज़ैमां कुत्बुद्दीन के घर पर यह मिसाल शरीफ पढ़ रहे है. मिसाल शरीफ पढ़ कर सैयदना बुरहानुद्दीन ने इस तरह के जुमले फरमाएँ कि यह एक लाकीमती (अमूल्य) खज़ाना है.

بسم الله الرحمن الرحيم

सलाम - जिसका मिनार खालिस शरफ (इज्ज़त) के घर में बुलंद है, जिसका मजाल खानदानी मज्द के आसमान में वासेअ है, मेरे फरजंद आप पर, जो मुझे सबसे अहब (प्यारे), सबसे आज़ (बहुत ही अज़ीज़), सबसे अगर (बहुत रोशन), अकरम (बहुत करामत वाले), सबसे नेक, मेरे जिगर के टुकड़े, मेरे दिल की बेह्जत, जो बुलंदिओं के आसमान में रोशन सितारा है,

सिआदत (महानुभव) के सितारे, एक हद्द (मकाम) जिसकी तकदीर अज़ीम है,  हिदायत के सही रास्ते पर चलनेवाले, अपने सीने में हक्क के हकीकत के मोती और जवाहरात को समा लेनेवाले, दावत ए हादिया के आसमान में चमकते है पूनम की रात में चंदरमा की तरह, जिनका नाम खुज़ैमा है और लकब कुत्बुद्दीन है, जो सियासत महमूदा और पुख्ता राय से अमल करते है। खुदा आपको लम्बी उम्र अता करे, आपकी शोहरत को आलम मे फ़ैलाये, खुदा अपनी हिफाज़त किलायत में आपको बाकी रखे और आप पर इनायत और रिआयत की नज़र फरमाए। अम्मा बाद:

आपका उमदा ख़त, दिल को खुश कर दे ऐसा ख़त, जो आपने खालिस मोहब्बत और फिदागिरी के जज़्बे से लिखा और शुकुर के भारी मोती जैसे अलफ़ाज़ से संवारा है, हमें मिला, और मुमिनीन के भी कई टेलीग्राम पहुंचे है (जिसमे उदैपुर के मुमिनीन ने शुकुर किया और आपकी तारीफ़ की) जिसके सबब मुझे बेहद ख़ुशी हुइ और मेरी आँखों को ठंडक पहुंची है । इन बेशुमार नेअमतों पर, जो हमेशा बरसती है मैंने खुदा का हम्द और शुकुर किया, और वलीउल्लाह, इमाम उज़ ज़मान, का शुकुर किया जो वली उल फतहे वल नस्र है, उनके अज़ीम एहसानात और करीम बखशिशो का शुकुर किया कि आप ने खुदा तआला की यारी से और खुदा के वली इमाम उज़ ज़मान की ताईद की सवारी के सरयान से, खिलती हुइ नौजवानी में, अशरा मुबारका में वाअज़ अक्द की, और बहुत ही बेहतर वाअज़ की। खुदा तआला और वलीउल्लाह इमाम उज़ ज़मान और उनके दाई आपकी खिदमत कबूल फरमाए, बेहतर तरीके से कबूल फरमाएँ।

अशरा के बाद आप ने दावत ए हादीया गर्रा के उमूर में नज़र फरमाई, मुमिनीन की जमाअत के उमूर में भी नज़र फरमाई और बेहतर जमील तदबीर की । खुदा तआला आप की तरफ अपनी और वलीउल्लाह की नेअमत बाद नेअमत जारी करे।

यहाँ हम बेहम्दिल्लाह और खुदा के वली इमाम उज़ ज़मान, खुदा आप पर सलाम पढ़े, उनकी की नेअमतों में सुबह शाम रहते है । और हर अमर में दोआत सालेफीन मुतलकीन की इकतेदा करते है, जो दोआत मुतलकीन अपने इमामों, मुत्तकीन के इमाम, दावत के सफीने को खुदा के नाम से चलाते है, और लंगराते है।

बाद, आप के शहर के एहले वला मुमिनीन को जो मुख्लेसीन है, और सच्ची मोहब्बत करनेवाले है उनको भी हमारे सलाम से ख़ास करता हूँ। उनके हक में दोआ करता हूँ कि खुदा उनकी तरफ बरकात को जारिया रखें, सआदत को पूरी अता करे, और उन सब को हिफाज़त और किलायत में रखे ।

वससलाम।

 

यह कागज़ २४ वि रबीउल अव्वल, सन १३८० हि. की रात को लिखा है

मौजें मुंबई से मौजें उदैपुर।

यह कागज़ लिखा है आले मोहम्मद अत तैयेबीन अत ताहेरीन के ममलूक, जो खुदा तआला और आले मोहम्मद की तरफ़ इब्तेहाल के साथ नसरे अज़ीज़ और फ़तहे मुबीन की इल्तेजा करता है, मोहम्मद के वालिद (अबू मोहम्मद), जो तुम्हारे वालिद है, जो तुम्हे हर घड़ी गायतुल मोहब्बत और हनीन के साथ याद करते है ।

ताहेर सैफुद्दीन